बाल कविताएँ -सोहन लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi Part 1

बाल कविताएँ -सोहन लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi Part 1

हाथी और खरगोश

खटपट, खटपट, खटपट, खटपट,
क्या करते हो बच्चो, नटखट?
आओ, इधर दौड़ कर झटपट,
तुमको कथा सुनाऊँ चटपट!

नदी नर्मदा के निर्मल तट,
जहाँ जंगलों का है जमघट,
वहीं एक था बड़ा सरोवर,
जिसकी शोभा बड़ी मनोहर!

इसी सरोवर में निशिवासर,
हाथी करते खेल परस्पर।
एक बार सूखा सर वह जब,
तब की कथा सुनो बच्चो अब।

पड़े बड़े दुख में हाथी सब,
कहीं नहीं जल दिखलाया जब-
सारे हाथी होकर अनमन,
चले ढूँढ़ने जल को बन बन।

मेहनत कभी न होती निष्फल,
उनको मिला सरोवर निर्मल।
शीतल जल पीकर जी भरकर,
लौटे सब अपने अपने घर।

हाथी वहीं रोज जाते सब,
खेल खेल कर घर आते सब।
किन्तु, सुनो बच्चो चित देकर,
जहाँ मिला यह नया सरोवर।

वहीं बहुत खरगोशों के घर,
बने हुए थे सुन्दर सुन्दर।
हाथी के पाँवों से दब कर,
वे घर टूट बन गए खँडहर!

खरगोशों के दिल गए दहल,
कितने ही खरगोश गए मर,
वे सब थे अनजान बेखबर!

सब ने मिलकर धीरज धारा,
सबने एक विचार विचारा।
जिससे टले आपदा सारी,
ऐसी सब ने युक्ति विचारी।

उनमें था खरगोश सयाना,
जिसने देखा बहुत जमाना।
बात सभी को उसकी भायी,
उसने कहा, करो यह भाई-

बने एक खरगोश दूत अब,
काम करे बनकर सपूत सब।
जाकर कहे हाथियों से यह,
उसके सभी साथियों से यह,

हम खरगोश, हमारा यह सर,
श्री खरगोश हमारे नृपवर।
चारु चन्द्र उनका सिंहासन,
जहाँ बैठ देते वे दर्शन!

हमको है नृपवर ने भेजा,
हुक्म उनहोंने हमें सहेजा।
जाकर कहो हाथियों से यह,
उनके सभी साथियों से यह।

अब न कभी तुम सर में आना,
होगा वरना मौत बुलाना!
जुल्म किया तुमने हम पर,
सब घर तोड़ बनाये खँडहर!!

अगर नहीं मानोगे कहना,
तुम्हें पड़ेगा संकट सहना।
मैं बिजुली का अंकुश लेकर,
नाश करूँगा तुम्हें पकड़ कर!

इससे अच्छा है मत आओ,
खरगोशों को अब न सताओ।
किसी दूसरे सर को ढूँढ़ो,
अब न कभी आना तुम मूढ़ो!

मुमकिन है सच बात जानकर,
मुमकिन है यह बात मानकर।
हाथी फिर न सरोवर आवें,
और हमारे घर बच जावें।

हुई बात भी कुछ ऐसी ही,
सोची गई घात जैसी ही।
अब आगे की सुनो कहानी,
चला दूत ले हुक्म जबानी।

सभी हाथियों के ढिंग आया,
गरज गरज कर हुक्म सुनाया।
हाथी सहम गए सब सुन सुन,
हाथी सभी हो गए गुन मुन!

किन्तु एक था उनमें बलधर,
वह बोला चिंघाड़ मार कर।
बात तुम्हारी जानूँ सच जब,
बात तुम्हारी मानूँ सच सब!

बातें तुम न मुझे सिखलाओ,
बस अपने नृप को दिखलाओ।
चारु चन्द्र जिनका सिंहासन,
जहाँ बैठ वे देते दर्शन।

बोला दूत, चलो तुम सर को,
मैं दिखलाऊँगा नृपवर को।
आये दूत और हाथी सर,
राह निखरने लगी वहीं पर।

हुई रात जब, झलमल झलमल,
नभ में तारे निकले निर्मल।
खिली चाँदनी, खिला सरोवर,
दृश्य बड़ा ही बना मनोहर।

आया चाँद मनोहर सुन्दर,
नीले नीले आसमान पर।
उसकी छाया निर्मल जल पर,
चमकी अतिशय सुन्दर सुन्दर।

चारु चन्द्र जिनका सिंहासन,
जहाँ बैठ देते वह दर्शन!
हाथी ने देखा तब जल पर,
बिम्ब चन्द्रमा का अति सुन्दर।

बोला दूत, शीश ऊपर कर,
देखो! वहाँ, बीच में, जल पर,
आसमान से अभी उतर कर,
आये श्रीखरगोश नृपतिवर।

अहा! चाँद के बीच मंच पर,
है खरगोश दीखता मनहर!
मन ही मन यह समझा बलधर,
श्रीखरगोश यही हैं नृपवर!

सचमुच हुक्म उन्होंने भेजा,
इसको सचमुच काम सहेजा।
हाथी लौट तुरत सर आया,
बोला, नृपवर से मिल आया।

बोला सभी हाथियों से वह,
बोला सभी साथियों से वह।
जाना ठीक न सचमुच सर में,
जाना मौत बुलाना घर में।

तब से कभी न हाथी आये,
और न उनके साथी आये।
खरगोशों ने युक्ति निकाली,
आयी बला शीश से टाली!

फिर बन गए नये घर सुन्दर,
लहरीं जिनपर लता मनोहर।
हुए सभी खरगोश मगन मन,
रहने लगे खुशी हो छन छन।

 

गुरू और चेला

गुरू एक थे, और था एक चेला,
चले घूमने पास में था न धेला।

चले चलते-चलते मिली एक नगरी,
चमाचम थी सड़कें चमाचम थी डगरी।
मिली एक ग्वालिन धरे शीश गगरी,
गुरू ने कहा तेज ग्वालिन न भग री।

बता कौन नगरी, बता कौन राजा,
कि जिसके सुयश का यहाँ बजता बाजा।
कहा बढ़के ग्वालिन ने महाराज पंडित,
पधारे भले हो यहाँ आज पंडित।

यह अंधेर नगरी है अनबूझ राजा,
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा।
मज़े में रहो, रोज लड्डू उड़ाओ,
बड़े आप दुबले यहाँ रह मुटाओ।

खबर सुनके यह खुश हुआ खूब चेला,
कहा उसने मन में रहूँगा अकेला।
मिले माल पैसे का दूँगा अधेला,
मरेंगे गुरू जी मुटायेगा चेला।

गुरू ने कहा-यह है अंधेर नगरी,
यहाँ पर सभी ठौर अंधेर बगरी।
किसी बात का ही यहाँ कब ठिकाना?
यहाँ रहके अपना गला ही फँसाना।

गुरू ने कहा-जान देना नहीं है,
मुसीबत मुझे मोल लेना नहीं है।
न जाने की अंधेर हो कौन छन में?
यहाँ ठीक रहना समझता न मन में।

गुरू ने कहा किन्तु चेला न माना,
गुरू को विवश हो पड़ा लौट जाना।
गुरूजी गए, रह गया किन्तु चेला,
यही सोचता हूँगा मोटा अकेला।

चला हाट को देखने आज चेला,
तो देखा वहाँ पर अजब रेल-पेला।
टके सेर हल्दी, टके सेर जीरा,
टके सेर ककड़ी, टके सेर खीरा।

टके सेर मिलता था हर एक सौदा,
टके सेर कूँड़ी, टके सेर हौदा।
टके सेर मिलती थी रबड़ी मलाई,
बहुत रोज़ उसने मलाई उड़ाई।

सरंगी था पहले हुआ अब मुटल्ला,
कि सौदा पड़ा खूब सस्ता पल्ला।
सुनो और आगे का फिर हाल ताजा।
थी अन्धेर नगरी, था अनबूझ राजा।

बरसता था पानी, चमकती थी बिजली,
थी बरसात आई, दमकती थी बिजली।
गरजते थे बादल, झमकती थी बिजली,
थी बरसात गहरी, धमकती थी बिजली।

लगी ढाने दीवार, मकान क्षण क्षण,
लगी चूने छत, भर गया जल से आँगन।
गिरी राज्य की एक दीवार भारी,
जहाँ राजा पहुँचे तुतर ले सवारी।

झपट संतरी को डपट कर बुलाया,
गिरी क्यों यह दीवार, किसने गिराया?
कहा सन्तरी ने-महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, या मेरा करतब!

यह दीवार कमजोर पहले बनी थी,
इसी से गिरी, यह न मोटी घनी थी।
खता कारीगर की महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, या मेरा करतब!

बुलाया गया, कारीगर झट वहाँ पर,
बिठाया गया, कारीगर झट वहाँ पर।
कहा राजा ने-कारीगर को सज़ा दो,
ख़ता इसकी है आज इसको कज़ा दो।

कहा कारीगर ने, ज़रा की न देरी,
महाराज! इसमें ख़ता कुछ न मेरी।
यह भिश्ती की ग़लती यह उसकी शरारत,
किया गारा गीला उसी की यह गफलत।

कहा राजा ने-जल्द भिश्ती बुलाओ।
पकड़ कर उसे जल्द फाँसी चढ़ाओ।
चला आया भिश्ती, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने-इसमें खता कुछ न मेरी।

यह गलती है जिसने मशक को बनाया,
कि ज्यादा ही जिसमें था पानी समाया।
मशकवाला आया, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने इसमें खता कुछ न मेरी।

यह मन्त्री की गलती है मन्त्री की गफलत,
उन्हीं की शरारत, उन्हीं की है हिकमत।
बड़े जानवर का था चमड़ा दिलाया,
चुराया न चमड़ा मशक को बनाया।

बड़ी है मशक खूब भरता है पानी,
ये गलती न मेरी, यह गलती बिरानी।
है मन्त्री की गलती तो मन्त्री को लाओ,
हुआ हुक्म मन्त्री को फाँसी चढ़ाओ।

हुआ मन्त्री हाजिर बहुत गिड़गिड़ाया,
मगर कौन सुनता था क्या बिड़ड़िाया।
चले मन्त्री को लेके जल्लाद फौरन,
चढ़ाने को फाँसी उसी दम उसी क्षण।

मगर मन्त्री था इतना दुबला दिखाता,
न गरदन में फाँसी का फंदा था आता।
कहा राजा ने जिसकी मोटी हो गरदन,
पकड़ कर उसे फाँसी दो तुम इसी क्षण।

चले संतरी ढूँढ़ने मोटी गरदन,
मिला चेला खाता था हलुआ दनादन।
कहा सन्तरी ने चलें आप फौरन,
महाराज ने भेजा न्यौता इसी क्षण।

बहुत मन में खुश हो चला आज चेला,
कहा आज न्यौता छकूँगा अकेला!!
मगर आके पहुँचा तो देखा झमेला,
वहाँ तो जुड़ा था अजब एक मेला।

यह मोटी है गरदन, इसे तुम बढ़ाओ,
कहा राजा ने इसको फाँसी चढ़ाओ!
कहा चेले ने-कुछ खता तो बताओ,
कहा राजा ने-‘चुप’ न बकबक मचाओ।

मगर था न बुद्धु-था चालाक चेला,
मचाया बड़ा ही वहीं पर झमेला!!
कहा पहले गुरु जी के दर्शन कराओ,
मुझे बाद में चाहे फाँसी चढ़ाओ।

गुरूजी बुलाये गये झट वहाँ पर,
कि रोता था चेला खड़ा था जहाँ पर।
गुरू जी ने चेले को आकर बुलाया,
तुरत कान में मंत्र कुछ गुनगुनाया।

झगड़ने लगे फिर गुरू और चेला,
मचा उनमें धक्का बड़ा रेल-पेला।
गुरू ने कहा-फाँसी पर मैं चढँूगा,
कहा चेले ने-फाँसी पर मैं मरूँगा।

हटाये न हटते अड़े ऐसे दोनों,
छुटाये न छुटते लड़े ऐसे दोनों।
बढ़े राजा फौरन कहा बात क्या है?
गुरू ने बताया करामात क्या है।

चढ़ेगा जो फाँसी महूरत है ऐसी,
न ऐसी महूरत बनी बढ़िया जैसी।
वह राजा नहीं, चक्रवर्ती बनेगा,
यह संसार का छत्र उस पर तनेगा।

कहा राजा ने बात सच गर यही
गुरू का कथन, झूठ होता नहीं है
कहा राजा ने फाँसी पर मैं चढूँगा
इसी दम फाँसी पर मैं ही टँगूँगा।

चढ़ा फाँसी राजा बजा खूब बाजा
थी अन्धेर नगरी, था अनबूझ राजा
प्रजा खुश हुई जब मरा मूर्ख राजा
बजा खूब घर घर बधाई का बाजा।

 

कबूतर

भोले-भाले बहुत कबूतर
मैंने पाले बहुत कबूतर
ढंग ढंग के बहुत कबूतर
रंग रंग के बहुत कबूतर
कुछ उजले कुछ लाल कबूतर
चलते छम छम चाल कबूतर
कुछ नीले बैंजनी कबूतर
पहने हैं पैंजनी कबूतर
करते मुझको प्यार कबूतर
करते बड़ा दुलार कबूतर
आ उंगली पर झूम कबूतर
लेते हैं मुंह चूम कबूतर
रखते रेशम बाल कबूतर
चलते रुनझुन चाल कबूतर
गुटर गुटर गूँ बोल कबूतर
देते मिश्री घोल कबूतर।

 

ओस

हरी घास पर बिखेर दी हैं
ये किसने मोती की लड़ियाँ?
कौन रात में गूँथ गया है
ये उज्‍ज्‍वल हीरों की करियाँ?

जुगनू से जगमग जगमग ये
कौन चमकते हैं यों चमचम?
नभ के नन्‍हें तारों से ये
कौन दमकते हैं यों दमदम?

लुटा गया है कौन जौहरी
अपने घर का भरा खजा़ना?
पत्‍तों पर, फूलों पर, पगपग
बिखरे हुए रतन हैं नाना।

बड़े सवेरे मना रहा है
कौन खुशी में यह दीवाली?
वन उपवन में जला दी है
किसने दीपावली निराली?

जी होता, इन ओस कणों को
अंजली में भर घर ले आऊँ?
इनकी शोभा निरख निरख कर
इन पर कविता एक बनाऊँ।

 

एक किरण आई छाई

एक किरण आई छाई,
दुनिया में ज्योति निराली
रंगी सुनहरे रंग में
पत्ती-पत्ती डाली डाली

एक किरण आई लाई,
पूरब में सुखद सवेरा
हुई दिशाएं लाल
लाल हो गया धरा का घेरा

एक किरण आई हंस-हंसकर
फूल लगे मुस्काने
बही सुंगंधित पवन
गा रहे भौरें मीठे गाने

एक किरण बन तुम भी
फैला दो दुनिया में जीवन
चमक उठे सुन्दर प्रकाश से
इस धरती का कण कण

 

नटखट पांडे

नटखट पांडे आए आए
पकड़ किसी का घोड़ा लाए

घोड़े पर हो गए सवार
घोड़ा चला कदम दो चार

नटखट थे पूरे शैतान
लगा दिये दो कोड़े तान

घोड़ा भगा देख मैदान
नटखट पांडे गिरे उतान

 

उठो लाल अब आँखें खोलो

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लायी हूँ मुंह धो लो।

बीती रात कमल दल फूले,
उसके ऊपर भँवरे झूले।

चिड़िया चहक उठी पेड़ों पे,
बहने लगी हवा अति सुंदर।

नभ में प्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई।

भोर हुई सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया।

नन्ही नन्ही किरणें आई,
फूल खिले कलियाँ मुस्काई।

इतना सुंदर समय मत खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ।

 

कौन सिखाता है चिडियों को

कौन सिखाता है चिडियों को
चीं–चीं चीं–चीं करना?
कौन सिखाता फुदक–फुदक कर
उनको चलना फिरना?

कौन सिखाता फुर से उड़ना
दाने चुग-चुग खाना?
कौन सिखाता तिनके ला–ला
कर घोंसले बनाना?

कौन सिखाता है बच्चों का
लालन-पालन उनको?
माँ का प्यार, दुलार, चौकसी
कौन सिखाता उनको?

कुदरत का यह खेल,
वही हम सबको, सब कुछ देती।
किन्तु नहीं बदले में हमसे
वह कुछ भी है लेती।

हम सब उसके अंश
कि जैसे तरू–पशु–पक्षी सारे।
हम सब उसके वंशज
जैसे सूरज–चांद–सितारे।

 

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