बापूजी कहते थे-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

बापूजी कहते थे-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

बापूजी कहते थे
दिल्ली खुद नहीं उजड़ती
सिर्फ उजाड़ती है
छोटे-बड़े गाँव
घर दर चूलें-चौखटें।
खूँटों से खोल देती है
पशु बछड़े
आवारा राजनेताओं के
चरने को
चारागाह बनती है।

दिल्ली कहाँ उजड़ती है?
दिल्ली सिर्फ पति बदलती है
स्वाद बदलती है जिस्मों के
भटकती फिरती है दर-दर आवारा।
तख्त पर बैठने का चोगा पहनके
ऐरे-गैरे शिकारी
पिंजरे में डाल लेती है।
सपनों को आवाज़ देती है
बेचती कमाती कुछ नहीं
बड़ी तेज़ है दिल्ली नखराली।

वे अक्सर कहते
इसकी ईंटें न देखो
नियत परखो
नजर कहाँ है
और निशाना कहीं और।
महाभारत से चलती-चलती
भारत तक पहुँची
अब फिर कूची उठाए घूम रही है
हर कूचे के माथे
हिंदुस्तान लिखने को।
पुराने किले के पास खो गया
हमारा गाँव इंद्रप्रस्थ।

मालिक पाडंव कुली बने
रेलवे स्टेशन पर
मर रहे हैं वजन ढोते-ढोते।
हमायूँ किले का मालिक नहीं अब
मकबरे में कैद है
बना फिरता था
बड़ा शहंशाह।

बापूजी ने बताया है
दिल्ली खुद अगर
सात बार उजड़ी
इस ने हमें भी
सैंकड़ों दफा उजाड़ा है।
ये तो फिर बस जाती है
सपने खानी छिनार।

लँगड़ा तैमूर हो या नादिर
फिरंगियों तक लंबी कतार
बिगड़ैल घोड़ों की
कुचलते फिरे जो प्यार से सींचा
फुलकारी सा देस।
अब भी भटकती रूहें
नहीं टिकती।

औरंगज़ेब कब्र से उठकर
आधी रात भी हूटर बजाता गुजरता है
हमारी नींद का दुश्मन
पता नहीं किस लिए
गलियाँ छानता फिरता है?
उजड़े बागों का बातूनी पटवारी।

बापूजी ठीक कहते हैं
लाल किले की प्राचीर
झूठ सुन-सुन उकता, थक गई है
पुरानी किताबें वही सबक
सिर्फ जीभ बदलती है।
झुग्गियाँ बिकती हैं
दो मुट्ठी आटे के बदले
ज़मीरों की मंडी में
नीलाम कुर्सियाँ
अपना जिस्म नहीं बेचती अब
नए खुले सत्ता के जी बी रोड पर
सदाचार बेचती हैं।

कुर्बानियों वाले पूछते हैं
कौन हैं ये चापलूस बच्चे?
हाय बहादुर, सरदार बहादुर
कृपाण बहादुर कहाँ गए?
जवाब मिला
हमारे दरबान दरवाजों पर।
दिल और दिल्ली फिर उजड़ती है
जब सुनती है सड़ा सा जवाब
जिन गलों में
जलते हार हैं टायरों के
राज बदले नहीं अभी डायरों के।
दिल्ली कब उजड़ती है?
ये तो उजाड़ती है बागों के बाग
उल्लू बोलते हैं
चेहरे बदल-बदल
वृक्ष डोलता है
धरा काँपती है
पर उजड़ते हम ही क्यों हैं?
दिल्ली तो फिर नया पति ढूँढ लेती है।

बहुत उदास हैं बापूजी ये सब देखके
कि विधवा बस्ती इंसाफ के लिए
तारीखें भुगती मिट चली है।
आंसुओं और आहों के बंजारे
चुनाव समय बेच लेते हैं चिताएं
फिर तख़्त पर बैठते ही भूल जाते हैं
बूढ़ी माँ की आँख के लिए दवा
बीमार विधवा बेटी के लिए जड़ी-बूटी।

बापूजी ठीक कहते थे
उजड़े दिलों के लिए दिल्ली
तख़्त नहीं तखता है
जहाँ फाँसी पे लटकाए जाते हैं
अब भी सुनहरे ख्वाव।
दिल्ली नहीं उजड़ती
सिर्फ उजाड़ती है।

 

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