बाद का वसन्त (पिन्नत्ते वसन्तम्)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

बाद का वसन्त (पिन्नत्ते वसन्तम्)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

 

अपने मधुर कण्ठ से मधुमास की विजय-तुरही बजानेवाली कोयल

अपने मधुर कण्ठ से
मधुमास की विजय-तुरही बजानेवाली कोयल
घोषणा कर रही है :
“पान करो अपने जीवन का मधु
अविलम्ब, आकण्ठ,
बहता जा रहा है समय-रूपी पीयूष
सम्भव है तृषा-शमन का अवसर तुम्हें फिर न मिले ।
यह प्यारा जीवन-
अश्रु-हास्य का रसायन,
अमूल्य होने पर भी क्षणिक है-
जैसे धूप में नन्ही-सी हिम-कणिका-
क्यों खोते हो इस को व्यर्थ ?”

प्यारी-प्यारी तितलियाँ
सतरंगी इन्द्रधनुष की फुहार-सी
भावातुर होकर मण्डरा रही हैं
कानन-कलिकाओं के चारों ओर,
खोल दी हैं आँखें जिन्होंने
कोयल की कूक सुनकर।
उदयारुण का उज्ज्वल मयूख
है आरक्त आनन
मानो पी है मदिरा बारम्बार,
करता है आलिंगन
आसमान पर सोयी कृश मेघमाला का
जगाता है उसे चुम्बनों से ऐसे
कि हो जाते हैं मृदुल कपोल लाल ।

यह नवल पाटल सुन्दरी
अरुण और द्युतिमय है गाल जिस के,
बोल ही नहीं पाती है लज्जा-निमग्न कुछ भी ;
किन्तु जब प्रयाणोन्मुख होता है तरुण पवन
तब रोकना चाहती है बाट उस की
अपने सुललित निश्वासों से।
यह भाव-तरल प्रभात का तारा
भूल गया है स्वयं को
विस्मय से देख-देखकर लावण्यवती कुन्दलता को
खड़ी है जो मनोरम मन्द-हास लिये मुख पर,
नहीं जानता है वह कि
दिवस ने अपने अरुण नयन खोल दिये हैं
और साथी सारे दूर चले गये हैं !

दिवंगता रजनी की स्मृतियों में डूबा यह चाँद

दिवंगता रजनी की स्मृतियों में डूबा यह चाँद
हंसना ही भूल गया है,
चला गया है
क्षीण, विवर्ण, अश्रुपंकिल होकर;
जब सुख खिलता है एक ओर
तो दुःख आ पहुंचता है उसे चुनने को दूसरी ओर !
वसन्त ने कोंपलों को
दिव्य सुख की इतनी सारी मदिरा पिला दी
कि उन के आनन नशे से लाल हो गये-
तभी कराहने लगीं निराशा से भरे
अत्यन्त परुष-स्वर में
कुछ सूखी पत्तियाँ।

जो थी मेरी आँखों की सुषमा,
जो थी इस पृथ्वी के लिए सुन्दर देदीप्यमान ऊषा
वह पुण्यलतिका आमूल उखड़ गयी है,
बन गया है मेरा जीवन मरुभूमि ।

हे कुसुम-काल!
तुम्हारे पदार्पण की वेला में भी
मेरा मन क्यों बना हुआ है
निराशा-निहत और असुन्दर ?
निर्दयता से उजाड़ दिया है विधि ने इसे,
कैसे फूटेंगी इस में आशा की कलियाँ और सुख के पल्लव ?
कोकिलाओ, व्यर्थ क्यों पुकार रही हो?
तुम्हारी सखी तो गलकर मिट्टी में मिल गयी है।
क्यों भरतीं लम्बी उसाँसें
नवकलिकाओ ?
क्यों होती हो अकारण ही चकित ?
यह जगत् तो फेन है मृत्यु-सागर का,
परिणामशील है यह !

“तरुण रवि किरणों के आलिंगन में बद्ध,
अनुपम सौन्दर्यमय यह अरुण गुलाब
भरकर अपना प्याला नवजीवन के मकरन्द से
जब लौटकर आयेगा, तो पहचान पाओगे उसे ?”
-उस ने पूछा था मुझ से एक बार,
शोकाकुल दृष्टि लिये।
शायद, पाया हो कोई नया कमनीय रूप
उस पुनीता ने!
अथवा पाया हो उस ने वह शोकहीन चिर-वासन्ती संसार
जहाँ जीवन विकस्वर होता है
अपना परिपूर्ण प्रेम-सौरभ फैलाकर !
जिन हाथों से मैं ने
उस की परिमल-वाहिनी काली अलकें सजायी थीं,
उन्हीं से अलंकृत करूं मैं विकल-भाग्य, निहत-जीवन
उस की समाधि को-
प्रफुल्ल पुष्प द्वारा।

-१९२७

 

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