बादशाह-दूती-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

बादशाह-दूती-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

रानी धरमसार पुनि साजा । बंदि मोख जेहि पावहिं राजा ॥
जावत परदेसी चलि आवहिं । अन्नदान औ पानी पावहिं ॥
जोगि जती आवहिं जत कंथी । पूछै पियहि, जान कोइ पंथी ॥
दान जो देत बाहँ भइ ऊँची । जाइ साह पहँ बात पहूँची ॥
पातुरि एक हुति जोगि-सवाँगी । साह अखारे हुँत ओहि माँगी ॥
जोगिनि-भेस बियोगिनि कीन्हा । सींगी-सबद मूल तँत लीन्हा ॥
पदमिनि पहँ पठई करि जोगिनि । बेगि आनु करि बिरह-बियोगिनि ॥

चतुर कला मन मोहन, परकाया-परवेस ।
आइ चढ़ी चितउरगढ़ होइ जोगिनि के भेस ॥1॥

 

माँगत राजबार चलि आई । भीतर चेरिन्ह बात जनाई ॥
जोगिनि एक बार है कोई । माँगै जैसि बियोगिनि सोई ॥
अबहीं नव जोबन तप लीन्हा । फारि पटोरहि कंथा कीन्हा ॥
बिरह-भभूत, जटा बैरागी । छाला काँध, जाप कँठलागी ॥
मुद्रा स्रवन, नाहिं थिर जीऊ । तन तिरसूल, अधारी पीऊ ॥
छात न छाहँ, धूप जनु मरई । पावँ न पँवरी, भूभुर जरई ॥
सिंगी सबद, धँधारी करा । जरै सो ठाँव पावँ जहँ धरा ॥

किंगरी गहे बियोग बजावै, बारहि बार सुनाव ।
नयन चक्र चारिउ दिसि (हेरहिं) दहुँ दरसन कब पाव ॥2॥

 

सुनि पदमावति मँदिर बोलाई । पूछा “कौन देस तें आई?॥
तरुन बैस तोहि छाज न जोगू । केहि कारन अस कीन्ह बियोगू” ॥
कहेसि बिरह-दुख जान न कोई । बिरहनि जान बिरह जेहि होई ॥
कंत हमार गएउ परदेसा । तेहि कारन हम जोगिनि भेसा ॥
काकर जिउ, जोबन औ देहा । जौ पिउ गएउ, भएउ सब खेहा ॥
फारि पटोर कीन्ह मैं कंथा । जहँ पिउ मिलहिं लेउँ सो पंथा ॥
फिरौं, करौं चहुँ चक्र पुकारा । जटा परीं, का सीस सँभारा?॥

हिरदय भीतर पिउ बसै, मिलै न पूछौं काहि?॥
सून जगत सब लागै, ओहि बिनु किछु नहिं आहि ॥3॥

 

स्रवन छेद महँ मुद्रा मेला । सबद ओनाउँ कहाँ पिउ खेला ॥
तेहि बियोग सिंगी निति पूरौं । बार बार किंगरी लेइ झूरौं ॥
को मोहिं लेइ पिउ कंठ लगावै । परम अधारी बात जनावै ॥
पाँवरि टूटि चलत, पर छाला । मन न भरै, तन जोबन बाला ॥
गइउँ पयाग, मिला नहिं पीऊ । करवत लीन्ह, दीन्ह बलि जीऊँ ॥
जाइ बनारस जारिउँ कया । पारिउँ पिंड नहाइउँ गया ॥
जगन्नाथ जगरन कै आई । पुनि दुवारिका जाइ नहाई ॥

जाइ केदार दाग तन, तहँ न मिला तिन्ह आँक ।
ढूँढि अजोध्या आइउँ सरग दुवारी झाँक ॥4॥

 

गउमुख हरिद्वार फिर कीन्हिउँ । नगरकोट कटि रसना दीन्हिउँ ॥
ढूँढिउँ बालनाथ कर टीला । मथुरा मथिउँ, नसो पिउ मीला ॥
सुरुजकुंड महँ जारिउँ देहा । बद्री मिला न जासौं नेहा ॥
रामकुंड, गोमति, गुरुद्वारू । दाहिनवरत कीन्ह कै बारू ॥
सेतुबंध, कैलास, सुमेरू । गइउँ अलकपुर जहाँ कुबेरू ॥
बरम्हावरत ब्रह्मावति परसी । बेनी-संगम सीझिउँ करसी ॥
नीमषार मिसरिख कुरुछेता । गोरखनाथ अस्थान समेता ॥

पटना पुरुब सो घर घर हाँडि फिरिउँ संसार ।
हेरत कहूँ न पिउ मिला, ना कोइ मिलवनहार ॥5॥

 

बन बन सब हेरेउँ नव खंडा । जल जल नदी अठारह गंडा ॥
चौसठ तीरथ के सब ठाऊँ । लेत फिरिउँ ओहि पिउ कर नाऊँ ॥
दिल्ली सब देखिउँ तुरकानू । औ सुलतान केर बंदिखानू ॥
रतनसेन देखिउँ बँदि माहाँ । जरै धूप, खन पाव न छाहाँ ॥
सब राजहि बाँधे औ दागे । जोगनि जान राज पग लागे ॥
का सो भोग जेहि अंत न केऊ । यह दुख लेइ सो गएउ सुखदेऊ ॥
दिल्ली नावँ न जानहु ढीली । सुठि बँदि गाढ़ि,निकस नहीं कीली ॥

देखि दगध दुख ताकर अबहुँ कया नहिं जीउ ।
सो धन कैसे दहुँ जियै जाकर बँदि अस पीउ? ॥6॥

 

पदमावति जौ सुना बँदि पीऊ । परा अगिनि महँ मानहुँ घीऊ ।
दौरि पायँ जोगिनि के परी । उठी आगि अस जोगिनि जरी ॥
पायँ देहि, दुइ नैनन्ह लाऊँ । लेइ चलु तहाँ कंत जेहि ठाऊँ ॥
जिन्ह नैनन्ह तुइ देखा पीऊ । मोहिं देखाउ, देहुँ बलि जीऊ ॥
सत औ धरम देहुँ सब तोहीं । पिउ कै बात कहै जौ मोहीं ॥
तुइ मोर गुरू, तोरि हौं चेली । भूली फिरत पंथ जेहि मेली ॥
दंड एक माया करु मोरे । जोगिनि होउँ, चलौं सँग तोरे ॥

सखिन्ह कहा, सुनु रानी करहु न परगट भेस ।
जोगी जोगवै गुपुत मन लेइ गुरु कर उपदेस ॥7॥

 

भीख लेहु, जोगिनि! फिरि माँगू । कंत न पाइय किए सवाँगू ॥
यह बड़ जोग बियोग जो सहना । जेहुँ पीउ राखै तेहुँ रहना ॥
घर ही महँ रहु भई उदासा । अँजुरी खप्पर, सिंगी साँसा ॥
रहै प्रेम मन अरुझा गटा । बिरह धँधारि, अलक सिर जटा ॥
नैन चक्र हेरे पिउ-कंथा । कया जो कापर सोई कंथा ॥
छाला भूमि, गगन सिर छाता । रंग करत रह हिरदय राता ॥
मन -माला फेरै तँत ओही । पाँचौ भूत भसम तन होहीं ॥

कुंडल सोइ सुनु पिउ-कथा, पँवरि पाँव पर रेहु ।
दंडक गोरा बादलहि जाइ अधारी लेहु ॥8॥

 

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