बादशाह-चढ़ाई-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

बादशाह-चढ़ाई-खंड-पद्मावत -मलिक मुहम्मद जायसी-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Malik Muhammad Jayasi

सुनि अस लिखा उठा जरि राजा । जानौ दैउ तड़पि घन गाजा॥
का मोहिं सिंघ देखावसि आई । कहौं तौ सारदूल धरि खाई ॥
भलेहिं साह पुहुमीपति भारी । माँग न कोउ पुरुष कै नारी ॥
जो सो चक्कवै ताकहँ राजू । मँदिर एक कहँ आपन साजू ॥
अछरी जहाँ इंद्र पै आवै । और न सुनै न देखै पावै ॥
कंस राज जीता जौ कोपी । कान्ह न दीन्ह काहु कहँ गोपी ॥
को मोहिं तें अस सूर अपारा । चढ़ै सरग, खसि परै पतारा ॥

का तोहिं जीउ मराबौं सकत आन के दोस?
जो नहिं बुझै समुद्र-जल सो बुझाइ कित ओस?॥1॥

 

राजा! अस न होहु रिस-राता । सुनु होइ जूड़, न जरि कहु बाता ॥
मैं हौं इहाँ मरै कहँ आवा । बादशाह अस जानि पठावा ॥
जो तोहि भार, न औरहि लेना । पूछहि कालि उतर है देना ॥
बादशाह कहँ ऐस न बोलू । चढ़ै तौ परै जगत महँ डोलू ॥
सूरहि चढ़त न लागहि बारा । तपै आगि जेहि सरग पतारा ॥
परबत उडहिं सूर के फूँके । यह गढ़ छार होइ एक झूँके ॥
धँसै सुमेरु, समुद गा पाटा । पुहुमी डोल, सेस-फन फाटा ॥

तासौं कौन लड़ाई? बैठहु चितउर खास ।
ऊपर लेहु चँदेरी, का पदमिनि एक दास?॥2॥

 

जौ पै घरनि जाइ घर केरी । का चितउर, का राज चँदेरी ॥
जिउ न लेइ घर कारन कोई । सो घर देइ जो जोगी होई ॥
हौं रनथँभउर-नाह हमीरू । कलपि माथ जेइ दीन्ह सरीरू ॥
हौं सो रतननसेन सक-बंधी । राहु बेधि जीता सैरंधी ॥
हनुवँत सरिस भार जेइ काँधा । राघव सरिस समुद जो बाँधा ॥
बिक्रम सरिस कीन्ह जेइ साका । सिंघलदीप लीन्ह जौ ताका ॥
जौ अस लिखा भएउँ नहिं ओछा । जियत सिंघ कै गह को मोछा?॥

दरब लेई तौ मानौं, सेव करौं गहि पाउ ।
चाहै जौ सो पदमिनी सिंघलदीपहि जाउ ॥3॥

 

बोलु न, राजा! आपु जनाई । लीन्ह देवगिरि और छिताई ॥
सातौ दीप राज सिर नावहिं । औ सँग चली पदमिनी आवहिं ॥
जेहि कै सेव करै संसारा । सिंघलदीप लेत कित बारा?॥
जिनि जानसि यह गढ़ तोहि पाहीं । ताकर सबै, तोर किछु नाहीं ॥
जेहि दिन आइ गढ़ी कहँ छेकिहि । सरबस लेइ, हाथ को टेकिहि?॥
सीस न छाँडै खेह के लागे । सो सिर छार होइ पुनि आगे ॥
सेवा करु जौ जियन तोहि, भाई । नाहिं त फेरि माँख होइ जाई ॥

जाकर जीवन दीन्ह तेहि अगमन सीस जोहारि ।
ते करनी सब जानै, काह पुरुष का नारि ॥4॥

 

तुरुक! जाइ कहु मरै न धाई । होइहि इसकंदर कै नाई ॥
सुनि अमृत कदलीबन धावा । हाथ न चढ़ा, रहा पछितावा ।
औ तेहि दीप पतँग होइ परा । अगिनि-पहार पाँव देइ जरा ॥
धरती लोह, सरग भा ताँबा । जीउ दीन्ह पहुँचत कर लाँबा ॥
यह चितउरगढ़ सोइ पहारू । सूर उठै तब होइ अँगारू ॥
जौ पै इसकंदर सरि लीन्हीं । समुद लेहु धँसि जस वै लीन्ही ॥
जो छरि आनै जाइ छिताई । तेहि छर औ डर होइ मिताई ॥
महूँ समुझि अस अगमन सजि राखा गढ़ साजु ।
काल्हि होइ जेहि आवन सो चलि आवै आजु ॥5॥

 

सरजा पलटि साह पहँ आवा । देव न मानै बहुत मनावा ॥
आगि जो जरै आगि पै सूझा । जरत रहै, न बुझाए बूझा ॥
ऐसे माथ न टावै देवा । चढ़ै सुलेमाँ मानै सेवा ॥
सुनि कै अस राता सुलतानू । जैसे तपै जेठ कर कर भानू ॥
सहसौ करा रोष अस भरा । जेहि दिसि देखै तेइ दिसि जरा ॥
हिंदू देव काह बर खाँचा? सरगहु अब न सूर सौं बाँचा ॥
एहि जग आगि जो भरि मुख लीन्हा । सो सँग आगि दुहुँ जग कीन्हा ॥

रनथंभउर जस जरि बुझा चितउर परै सो आगि ।
फेरि बुझाए ना बुझै, एक दिवस जौ लागि ॥6॥

 

लिखा पत्र चारिहु दिसि धाए । जावत उमरा बेगि बोलाए ॥
दुंद-घाव भा, इंद्र सकाना । डोला मेरु, सेस अकुलाना ॥
धरती डोलि, कमठ खरभरा । मथन-अरंभ समुद महँ परा ॥
साह बजाइ कढ़ा, जग जाना । तीस कोस भा पहिल पयाना ॥
चितउर सौंह बारिगह तानी । जहँ लगि सुना कूच सुलतानी ॥
उठि सरवान गगन लगि छाए । जानहु राते मेघ देखाए ॥
जो जहँ तहँ सूता जागा । आइ जोहार कटक सब लागा ॥
हस्ति घोड़ औ दर पुरुष जावत बेसरा ऊँट ।

जहँ तहँ लीन्ह पलानै, कटक सरह अस छूट ॥
चले पंथ बेसर सुलतानी । तीख तुरंग बाँक कनकानी ॥7॥

 

कारे, कुमइत, लील, सुपेते । खिंग कुरंग, बोज दुर केते ॥
अबलक, अरबी-लखी सिराजी । चौघर चाल, समँद भल, ताजी ॥
किरमिज, नुकरा, जरदे, भले । रूपकरान, बोलसर, चले ॥
पँचकल्यान, सँजाब, बखाने । महि सायर सब चुनि चुनि आने ॥
मुशकी औ हिरमिजी, एराकी । तुरकी कहे भोथार बुलाकी ॥
बिखरी चले जो पाँतिहि पाँती । बरन बरन औ भाँतिहि भाँती ॥

सिर औ पूँछ उठाए चहुँ दिसि साँस ओनाहि ।
रोष भरे जस बाउर पवन-तुरास उढाहिं ॥8॥

 

लोहसार हस्ती पहिराए । मेघ साम जनु गरजत आए ॥
मेघहि चाहि अधिक वै कारे । भएउ असूझ देखि अँधियारे ॥
जसि भादौं निसि आवै दीठी । सरग जाइ हिरकी तिन्ह पीठी ॥
सवा लाख हस्ती जब चाला । परवत सहित सबै जग हाला ॥
चले गयंद माति मद आवहिं । भागहिं हस्ती गंध जौ पावहिं ॥
ऊपर जाइ गगन सिर धँसा । औ धरती तर कहँ धसमसा ॥
भा भुइँचाल चलत जग जानी । जहँ पग धरहि उठै तहँ पानी ॥

चलत हस्त जग काँपा, चाँपा सेस पतार ।
कमठ जो धरती लेइ रहा, बैठि गएउ गजभार ॥9॥

 

चले जो उमरा मीर बखाने । का बरनौं जस उन्ह कर बाने ॥
खुरासान औ चला हरेऊ । गौर बँगाला रहा न केऊ ॥
रहा न रूम-शाम-सुलतानू । कासमीर, ठट्ठा मुलतानू ॥
जावत बड बड तुरुक कै जाती । माँडौबाले औ गुजराती ॥
पटना, उड़ीसा के सब चले । लेइ गज हस्ति जहाँ लगि भले ॥
कवँरु, कामता औ पिंडवाए । देवगिरि लेइ उदयगिरि आए ॥
चला परबती लेइ कुमाऊँ । खसिया मगर जहाँ लगि नाऊँ ॥

उदय अस्त लहि देस जो को जानै तिन्ह नाँव?॥
सातौ दीप नवौ खंड जुरे आई एक ठाँव ॥10॥

 

धनि सुलतान जेहिक संसारा । उहै कटक अस जोरै पारा ॥
सबै तुरुक-सिरताज बखाने । तबल बाज औ बाँधे बाने ॥
लाखन मार बहादुर जंगी । जँबुर, कमानै तीर खदंगी ॥
जीभा खोलि रअग सौं मढ़े । लेजिम घालि एराकिन्ह चड़ै ॥
चमकहिं पाखर सार-सँवारी । दरपन चाहि अधिक उजियारी ॥
बरन बरन औ पाँतिहि पाँती । चली सो सेना भाँतिहि भाँती ॥
बेहर बेहर सब कै बोली । बिधि यह खानि कहाँ दहुँ खोली?॥

सात सात जोजन कर एक दिन होइ पयान ।
अगिलहि जहाँ पयान होइ पछिलहि तहाँ मिलान ॥11॥

 

डोले गढ़, गढ़पति सब काँपै । जीउ न पेट;हाथ हिय चाँपै ॥
काँपा रनथँभउर गढ़ डोला । नरवर गएउ झुराइ, न बोला ॥
जूनागढ़ औ चंपानेरी । काँपा माडौं लेइ चँदेरी ॥
गढ़ गुवालियर परी मथानी । औ अँधियार मथा भा पानी ॥
कालिंजर महँ परा भगाना । भागेउ जयगढ़, रहा न थाना ॥
काँपा बाँधव, नरवर राना । डर रोहतास बिजयगिरि माना ॥
काँप उदयगिरि, देवगिरि डरा । तब सो छपाइ आपु कहँ धरा ॥

जावत गढ़ औ गढ़पति सब काँपै जस पात ।
का कहँ बोलि सौहँ भा बादसाह कर छात?॥12॥

 

चितउरगढ़ औ कुंभलनेरै । साजै दूनौ जैस सुमेरै ॥
दूतन्ह आइ कहा जहँ राजा । चढ़ा तुरुक आवै दर साजा ॥
सुनि राजा दौराई पाती । हिंदू-नावँ जहाँ लगि जाती ॥
चितउर हिंदुन कर अस्थाना । सत्रु तुरुक हठी कीन्ह पयाना ॥
आव समुद्र रहै नहिं बाँधा । मैं होई मेड भार सिर काँधा ॥
पुरवहु साथ, तुम्हारि बड़ाई । नाहिँ त सत को पार छँड़ाई ॥
जौ लहि मेड, रहै सुखसाखा । टूटे बारि जौइ नहिं राखा ॥

सती जौ जिउ महँ सत धरै, जरै न छाँडै साथ ।
जहँ बीरा तहँ चून है पान, सोपारी, काथ ॥13॥

 

करत जो राय साह कै सेवा । तिन्ह कहँ आइ सुनाव परेवा ॥
सब होइ एकमते जो सिधारे । बादसाह कहँ आइ जोहारे ॥
है चितउर हिंदुन्ह कै माता । गाढ़ परे तजि जाइ न नाता ॥
रतनसेन तहँ जौहर साजा । हिंदुन्ह माँझ आहि बड़ राजा ॥
हिंदुन्ह केर पतँग कै लेखा । दौरि परहिं अगिनी जहँ देखा ॥
कृपा करहु चित बाँधहु धीरा । नातरू हमहिं देह हँसि बीरा ॥
पुनि हम जाइ मरहिं ओहि ठाऊँ । मेटि न जाइ लाज सौं नाऊँ ॥

दीन्ह साह हँसि बीरा, और तीन दिन बीच ।
तिन्ह सीतल को राखै, जिनहिं अगिनि महँ मीच? ॥14॥

 

रतनसेन चितउर महँ साजा । आइ बजार बैठ सब राजा ॥
तोवँर बैस, पवाँर सो आए । औ गहलौत आइ सिर नाए ॥
पत्ती औ पँचवान, बघेले । अगरपार, चौहान, चँदेले ॥
गहरवार, परिहार जो कुरे । औ कलहंस जो ठाकुर जुरे ॥
आगे ठाढ़ बजावहिं ढाढी ।पाछे धुजा मरन कै काढी ॥
बाजहिं सिंगी, संख औ तूरा । चंदन खेवरे, भरे सेंदूरा ॥
सजि संग्राम बाँध सब साका । छाँडा जियन, मरन सब ताका ॥

गगन धरति जेइ टेका, तेहि का गरू पहार ।
जौ लहि जिउ काया महँ, परै सो अँगवै भार ॥15॥

 

गढ़ तस सजा जौ चाहै कोई । बरिस बीस लगि खाँग न होई ॥
बाँके चाहि बाँक गढ़ कीन्हा । औ सब कोट चित्र कै लीन्हा ॥
खंड खंड चौखंड सँवारा । धरी विषम गोलन्ह कै मारा ॥
ठाँवहि ठाँव लीन्ह तिन्ह बाँटी । रहा न बीचु जो सँचरे चाँटी ॥
बैठे धानुक कँगुरन कँगुरा । भूमि न आँटी अँगुरन अँगुरा ॥
औ बाँधे गढ़ गज मतवारे । फाटै भूमि होहिं जौ ठारे ॥
बिच बिच बुर्ज बने चहुँ फेरी । बाजहिं तबल, ढोल औ भेरी ॥

भा गढ़ राज सुमेरु जस, सरग छुवै पै चाह ।
समुद न लेखे लावै, गंग सहसमुख काह? ॥16॥

 

बादशाह हठि कीन्ह पयाना । इंद्र भँडार डोल भय माना ॥
नबे लाख असवार जो चढ़ा । जो देखा सो लोहे -मढ़ा ॥
बीस सहस घहराहिं निसाना । गलगंजहिं भेरी असमाना ॥
बैरख ढाल गगन गा छाई । चला कटक धरती न समाई ॥
सहस पाँति गज मत्त चलावा । धँसत अकास, धरत भुइँ आवा ॥
बिरिछि उचारि पेडि सौं लेहीं । मस्तक झारि डारि मुख देहीं ॥
चढ़हिं पहार हिये भय लागू । बनखँड खोह न देखहिं आगू ॥

कोइ काहू न सँभारै, होत आव तस चाँप ।
धरति आपु कहँ काँपै, सरग आपु कहँ काँप ॥17॥

 

चलीं कमानै जिन्ह मुख गोला । आवहिं चली, धरति सब डोला ॥
लागे चक्र बज्र के गढ़े । चमकहिं रथ सोने सब मढ़े ॥
तिन्ह पर विषम कमानैं धरीं । साँचे अष्टधातु कै ढरीं ॥
सौ सौ मन वै पीयहिं दारू । लागहिं जहाँ सो टूट पहारू ॥
माती रहहिं रथन्ह पर परी । सत्रुन्ह महँ ते होहिं उठि खरी ॥
जौ लागै संसार न डोलहिं । होइ भुइकंप जीभ जौ खोलहिं ॥
सहस सहस हस्तिन्ह कै पाँती । खींचहि रथ, डोलहिं नहिं माती ॥

नदी नार सब पाटहिं जहाँ धरहि वै पाव ।
ऊँच खाल बन बीहड़ होत बराबर आव ॥18॥

 

कहौं सिंगार जैसि वै नारी । दारू पियहिं जैसि मतवारी ॥
उठै आगि जौ छाँडहि साँसा । धुआँ जौ लागै जाइ अकासा ॥
कुच गोला दुइ हिरदय लाए । चंचल धुजा रहहिं छिटकाए ॥
रसना लूक रहहिं मुख खोले । लंका जरै सो उनके बोले ॥
अलक जँजीर बहुत गिउ बाँधे । खींचहिं हस्ती, टूटहिं काँधे ॥
बीर सिंगार दोउ एक ठाऊँ । सत्रुसाल गढ़भंजन नाऊँ ॥

तिलक पलीता माथे, दसन बज्र के बान ।
जेहि हेरहिं तेहि मारहिं, चुरकुस करहिं निदान ॥19॥

 

जेहि जेहि पंथ चली वै आवहिं । तहँ तहँ जरै, आगि जनु लावहिं ॥
जरहिं जो परवत लागि अकासा । बनखँड धिकहिं परास के पासा ॥
गैंड गयदँ जरे भए कारे । औ बन-मिरिग रोझ झवँकारे ॥
कोइल, नाग काग औ भँवरा । और जो जरे तिनहिं को सँवरा ॥
जरा समुद्र पानी भा खारा । जमुना साम भई तेहि घारा ॥
धुआँ जाम, अँतरिख भए मेघा । गगन साम भा धुँआ जो ठेघा ॥
सुरुज जरा चाँद औ राहू । धरती जरी, लंक भा दाहू ॥

धरती सरग एक भा, तबहु न आगि बुझाइ ॥
उठे बज्र जरि डुंगवै, धूम रहा जग छाइ ॥20॥

 

आवै डोलत सरग पतारा । काँपै धरति, न अँगवै भारा ॥
टूटहिं परबत मेरु पहारा । होइ चकचून उड़हिं तेहि झारा ॥
सत-खँड धरती भइ षटखंडा । ऊपर अष्ट भए बरम्हंडा ॥
इंद्र आइ तिन्ह खंडन्ह छावा । चढ़ि सब कटक घोड़ दौरावा ॥
जेहि पथ चल ऐरावत हाथी । अबहुँ सो डगर गगन महँ आथी ॥
औ जहँ जामि रही वह धूरी । अबहुँ बसै सो हरिचँद-पूरी ॥
गगन छपान खेह तस छाई । सूरुज छपा, रैनि होइ आई ॥

गएउ सिकंदर कजरिबन, तस होइगा अँधियार ।
हाथ पसारे न सूझै, बरै लाग मसियार ॥21॥

 

दिनहिं राति अस परी अचाका । भा रवि अस्त, चंद्र रथ हाँका ॥
मंदिर जगत दीप परगसे । पंथी चलत बसेरै बसे ॥
दिन के पंखि चरत उड़ि भागे । निसिके निसरि चरै सब लागे ॥
कँवल सँकेता, कुमुदिनि फूली । चकवा बिछुरा, चकई भूली ॥
चला कटक-दल ऐस अपूरी । अगिलहि पानी, पछिलहि धूरी ॥
महि उजरी, सायर सब सूखा । वनखँड रहेउ न एकौ रूखा ॥
गिरि पहार सब मिलि गे माटी । हस्ति हेराहिं तहाँ होइ चाँटी ॥

जिन्ह घर खेह हेराने, हेरत फिरत सो खेह ।
अब तौ दिस्ट तब आवै अंजन नैन उरेह ॥22॥

 

एहि विधि होत पयान सो आवा । आइ साह चितउर नियरावा ॥
राजा राव देख सब चढ़ा । आव कटक सब लोहे-मढ़ा ॥
चहुँ दिसि दिस्टि परा गजजूहा । साम-घटा मेघन्ह अस रूहा ॥
अध ऊरध किछु सूझ न आना । सरगलोक घुम्मरहिं निशाना ॥
चढ़ि धौराहर देखहि रानी । धनि तुइ अस जाकर सुलतानी ॥
की धनि रतनसेन तुइँ राजा । जा कह तुरुक कटक अस साजा ॥
बेरख ढाल केरि परछाहीं । रैनि होति आवै दिन माहीं ॥

अंध-कूप भा आवै, उड़त आव तस छार ।
ताल तलावा पोखर धूरि भरी जेवनार ॥23॥

 

राजै कहा करहु जो करना । भएउ असूझ, सूझ अब मरना ॥
जहँ लगि राज साज सब होऊ । ततखन भएउ सजोउ सँजोऊँ ॥
बाजे तबल अकूत जुझाऊ । चड़ै कोपि सब राजा राऊ ॥
करहिं तुखार पवन सौं रीसा । कंध ऊँच, असवार न दीसा ॥
का बरनौं अस ऊँच तुखारा । दुइ पौरी पहुँचै असवारा ॥
बाँधे मोरछाँह सिर सारहिं । भाँजहि पूछ चँवर जनु ढारहिं ॥
सजे सनाहा, पहुँची, टोपा । लोहसार पहिरे सब ओपा ॥

तैसे चँवर बनाए औ घाले गलझंप ।
बँधे सेत गजगाह तहँ,जो देखै सो कंप ॥24॥

 

राज-तुरंगम बरनौं काहा? आने छोरि इंद्ररथ-बाहा ॥
ऐस तुरंगम परहिं न दीठी । धनि असवार रहहिं तिन्ह पीठी!॥
जाति बालका समुद थहाए । सेत पूँछ जनु चँवर बनाए ॥
बरन बरन पाखर अति लोने । जानहु चित्र सँवारे सोने ॥
मानिक जड़े सीस औ काँधे । चँवर लाग चौरासी बाँधे ॥
लागे रतन पदारथ हीरा । बाहन दीन्ह, दीन्ह तिन्ह बीरा ॥
चढ़हिं कुँवर मन करहिं उछाहू । आगे घाल गनहिं नहिं काहू ॥

सेंदुर सीस चढ़ाए, चंदन खेवरे देह ।
सो तन कहा लुकाइय अंत होइ जो खेह ॥25॥

 

गज मैमँत बिखरे रजबारा । दीसहिं जनहुँ मेघ अति कारा ॥
सेत गयंद, पीत औ राते । हरे साम घूमहिं मद माते ॥
चमकहिं दरपन लोहे सारी । जनु परबत पर परी अँबारी ॥
सिरी मेलि पहिराई सूँडैं । देखत कटक पाँय तर रूदैं ॥
सोना मेलि कै दंत सँवारे । गिरिवर टरहिं सो उन्ह के टारे ॥
परबत उलटि भूमि महँ मारहिं । परै जो भीर पत्र अस झारहिं ॥
अस गयंद साजै सिंघली । मोटी कुरुम-पीठि कलमली ॥

ऊपर कनक-मंजुसा लाग चँवर और ढार ।
भलपति बैठे भाल लेइ औ बैठे धनुकार ॥ 26॥

 

असु-दल गज-दल दूनौ साजे । औ घन तबल जुझाऊ बाजे ॥
माथे मुकुट,छत्र सिर साजा । चढ़ा बजाइ इंद्र अस राजा ॥
आगे रथ सेना सब ठाढ़ी । पाछे धुजा मरन कै काढ़ी ॥
चढ़ा बजाइ चढ़ा जस इंदू । देवलोक गोहने भए हिंदू ॥
वैसे ही राजा रत्नसेन के साथ हिन्दू लोग चले ।
जानहु चाँद नखत लेइ चढ़ा । सूर कै कटक रैनि-मसि मढ़ा ॥
जौ लगि सूर जाइ देखरावा । निकसि चाँद घर बाहर आवा ॥
गगन नखत जस गने न जाहीं । निकसि आए तस धरती माहीं ॥

देखि अनी राजा कै जग होइ गएउ असूझ ।
दहुँ कस होवै चाहै चाँद सूर के जूझ ॥27॥

 

Leave a Reply