बादल-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

बादल-रात पश्मीने की-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

बादल-1

रात को फिर बादल ने आकर
गीले गीले पंजों से जब दरवाजे पर दस्तक दी,
झट से उठ के बैठ गया मैं बिस्तर में

अक्सर नीचे आकर रे कच्ची बस्ती में,
लोगों पर गुर्राता है
लोग बेचारे डाम्बर लीप के दीवारों पर–
बंद कर लेते हैं झिरयाँ
ताकि झाँक ना पाये घर के अंदर–

लेकिन, फिर भी–
गुर्राता, चिन्घार्ता बादल–
अक्सर ऐसे लूट के ले जाता है बस्ती,
जसे ठाकुर का कोई गुंडा,
बदमस्ती करता निकले इस बस्ती से!!

बादल-2

कल सुबह जब बारिश ने आकर खिड़की पर
दस्तक दी, थी
नींद में था मैं –बाहर अभी अँधेरा था!

ये तो कोई वक्त नहीं था, उठ कर उससे मिलने का!
मैंने पर्दा खींच दिया–
गीला गीला इक हवा का झोंका उसने
फूँका मेरे मुँह पर, लेकिन–
मेरी ‘सेन्स आफ ह्युमर’ भी कुछ नींद में थी–
मैंने उठकर ज़ोर से खिड़की के पट
उस पर भेड़ दिए–
और करवट लेकर फिर बिस्तर में डूब गया!

शयद बुरा लगा था उसको–
गुस्से में खिड़की के काँच पे
हत्थड़ मार के लौट गयी वह, दोबारा फिर
आयी नहीं — —
खिड़की पर वह चटखा काँच अभी बाकी है!!

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