बादल पंख बने-खुली आँखें खुले डैने -केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

बादल पंख बने-खुली आँखें खुले डैने -केदारनाथ अग्रवाल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kedarnath Agarwal

बादल
पंख बने पर्वत के,
फड़-फड़ फड़के,
घने हुए घहराए,
लेकिन
उसको उठा न पाए,
उड़ा न पाए,
लेकर भाग न पाए,
झरे-
झार-बौछार मारकर,
पानी होकर-
बरसे पानी,
उसके चारों ओर,
देह पाहनी
शीतलकाय हुई;
यह दिन
मुझको याद रहेगा
वर्षा मंगल का।

रचनाकाल: २८-०८-१९९१

 

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