बादल के जैसा मनुष्य-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part

बादल के जैसा मनुष्य-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part

 

मेरे सामने से टहलते हुए जाता है
वह एक बादल के जैसा मनुष्य
उसके शरीर के भीतर प्रवेश करने पर
मालूम पड़ता है कि
सारा पानी धरती पर झड़ जाएगा ।

मेरे सामने से टहलते हुए जाता है
वह एक बादल के जैसा मनुष्य
उसके सामने जाकर बैठने पर
मालूम पड़ता है कि
पेड़ की छाया आ जाएगी मेरे पास ।

वह देगा कि लेगा ?
वह क्या आश्रय चाहता है ?
न कि आश्रम में है …?
मेरे सामने से टहलते हुए जाता है
वह एक बादल के जैसा मनुष्य ।

उसके सामने जाकर खड़े होने पर
मैं भी सम्भवतः कभी किसी दिन
हो सकता हूँ बादल …?

 

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