बादल का अन्तर बरस रहा-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

बादल का अन्तर बरस रहा-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

बादल का अन्तर बरस रहा !

ठंडा पृथ्वी का हृदय हुआ,
फूटी मुस्कान कुसुम दल में,
मधुबन में मधु-होली होती जड़-जग का तृण-तृण सरस रहा !
बादल का अन्तर बरस रहा !

मदमत्त झूमता है कैसा,
वह अलि अपने यौवन-मधु में,
पर क्या मालूम उसे जग में कितनों का उर-मरु विरस रहा !
बादल का अन्तर बरस रहा !

उसके मानस मेँ जगा रही,
पर कितनी प्यास और पीड़ा,
वह विरही चातक बेचारा जो एक बूंद को तरस रहा !
बादल का अन्तर बरस रहा !

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