बादलों की फटन- कोयला और कवित्व -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

बादलों की फटन- कोयला और कवित्व -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

 

बादलों के बीच छोटी–सी फटन है,
ज्यों, गुलाबी रंग का परदा कहीं से फट गया हो।
इस फटन के बीच से होकर अगर मैं कूद जाऊँ,
कौन गिरने से उधर मुझको सँभालेगा?

मूढ! ये पत्थर नहीं, हैं फूल पानी के, धुओं के,
उस तरफ का फर्श भी हलका, मुलायम है;
कूदना हो तो अभी ही कूद जा ऊपर घटा में,
अन्यथा, क्षण में, फटन यह बन्द होती है।

 

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