बात वहशी की- अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

बात वहशी की- अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

हरे वन की स्वर्णिम सिंहनी
‘हरमुख’ पर्वत-सी गम्भीर
दूर घनेरे वन से लायी कोई
गुजरिया दूध मृगियों का
‘नील’ के तट पर
सूर्यास्त की थाह निहारती दहकती
‘क्लियोपेट्रा’

वन की ज्वाला में चमचमाता हिम को
उग्र देवदारु के शीश पर बैठा
युवा उकाव
गम्भीरता से
थाह ले रहा अपने चहुँओर क्षितिज तक फैले
वैभव की
हरे वन की स्वर्णिम सिंहनी
विश्वमोहिनी
और फूली साँस लिए वह आतुर-सा घोड़ा
आँखों में भय की छाया, चाह की चिंगारियों का संगम लिये
लहर तट की ओर दौड़ती
दौड़ते ही पलट आ लौटती
ज्योति के निर्मल पतंग चूम लेता
बन्दवी प्रहरियों के अग्निवत भालों का घेरा देख कर
पगलाया मजनू
तजते कैसे
और आहार करेगा मेरा क्या!

जहाँ भागूं लौटा दिया जाता हूँ फिर यहीं
कैसे भागूँ?
नज़रों की बाँहें लम्बी हो गयीं उसकी
नख से शिख तक काया मेरी सिहर उठी
दाँत तारे
पूवास सागर का उफान
नाख़ून कटार
कैसे जाने दूँ
चिपक रहूँगा
मुख के रोओं पर
गर्म लहू…!

 

This Post Has One Comment

Leave a Reply