बांसों का जंगल-नज़्में -अली अकबर नातिक -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ali Akbar Natiq ,

बांसों का जंगल-नज़्में -अली अकबर नातिक -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ali Akbar Natiq ,

मैं बांसों के जंगल में हूँ जिन के नेज़े बनते हैं
सिर्फ हरी लचकीली शाखों वाला जंगल बांसों का
जिस की रगों में बैठा पानी सुबह-ए- अज़ल से जारी है
सब्ज़ घनेरे पत्ते इस के, और पत्तों के साये हैं
नर्म ज़मीन और ठंडी मिटटी, और मिटटी की खुशबुएँ
मस्त खुनक मदहोश हवाएं हौले हौले चलती हैं
लोग मुसाफिर नील गगन के जंगल में आ जाते हैं
देख फ़िज़ाएं ख्वाब ज़दा मीठी नींदें सो जाते हैं
लेकिन सद अफ़सोस यहाँ के काले नाग क़यामत हैं
शाखों पर लटके रहते हैं और धरती पर रेंगते हैं
डस लेते हैं, खा जाते हैं, सांस हवा हो जाती है
आखिर खुद भी बन जाते हैं सांप के अंदर जाकर सांप
वाये कुछ मासूम यहाँ से बच कर भागने लगते हैं
लेकिन जंगल बांसों का है! जिन के नेज़े बनते हैं

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