बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part 19

बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part 19

 

वे जो वसन्तदिन

और एक
और एक दिन इसी तरह ढल जाता है पहाड़ के पीछे
और हम निःशब्द बैठे रहते हैं।
नीचे गाँव से उठ रहा है किसी हल्ले का आभास
हम एक-दूसरे का चेहरा देखते हैं।
अकड़ी हुई लताओं की मानिन्द लिपटे रहते हैं हम
और चेहरे पर आकर जम जाती हैं बर्फ़ की कणिकाएँ
इच्छा होती है सोचें कि हम
अतिकाय बर्फ़ीले-मानव हैं।
आग जलाकर बैठते हैं चारों ओर
कहते हैं, अहा, आओ गपशप की जाए।
वे जो वसन्तदिन थे…
वे जो वसन्तदिन थे…
और वसन्तदिन सचमुच हमारे हाथ छोड़
सूदूर जाने लगते हैं!

 

मत

इतने दिनों में क्या सीखा
एक-एक कर बता रहा हूँ, सुन लो.
मत किसे कहते हैं, सुनो
मत वही जो मेरा मत
जो साथ है मेरे मत के
वही महत, ज्ञानी भी वही
वही अपना मानुस, प्रियतम
उसे चाहिए टोपी जिसमें लगे हों
दो-चार पंख
उसे चाहिए छड़ी
क्योंकि वह मेरे पास रहता है
मेरे मत के साथ रहता है.
अगर वह इतना न रहे?
अगर कभी कोई दुष्ट हवा लगकर
उसमें कोई भिन्न मति जाग जाए?
इसलिए ध्यान रखना पड़ेगा कि
वह दुर्बुद्धि तुम्हें कहीं जकड़ न ले.
लोग उसे जानेंगे भी कैसे?
मैं बन्द कर दूँगा सारे रास्ते — हंगामे से नहीं —
चौंसठ कलाओं से
तुम्हें पता भी है मैंने कितनी कलाएँ सीख ली हैं?

 

टलमल पहाड़

जब चारों ओर दरारों से भर गया है पर्वत
तुम्हारी मृत आँखों की पलकों से
उभर रहा है वाष्प-गह्वर
और उसे ढँक देना चाहता है कोई अदृश्य हाथ,

दृष्टिहीन खोखल के प्रगाढ़ अंचल में
अविराम उतरते आ रहे हैं कितने ही कंकड़
और हम लोग पीली पड़ चुकी
सफ़ेद खोपड़ी के सामने खड़े हैं, थिर —
मानो कुहासे के भीतर से उठ रहा हो चाँद
हालाँकि आज भी सम्भव नहीं शिनाख़्त करना कि
इतने अभिशापों के भीतर-भीतर
विषैले लताबीज की परम्परा
किसने तुम्हारे मुँह में रख दी थी उस दिन
तन्द्रालस जाड़े की रात!

जब इस नील अधोनील श्वास के प्रतिबिम्ब में
बिखरी हुई पंक्तियाँ
काँपती रहती है वासुकि के फन पर
और मर्म के मर्मर में हाहाकार कर उठते हैं
तराई के जंगल
मैं तब भी जीवन की ही बात करता हूँ

जब जानवरों के पंजों के निशान देखते-देखते
दाखि़ल हो जाता हूँ
दिगन्त के अन्धेरे के भीतर-भीतर
किसी आरक्त आत्मघात के झुके कगार पर
मैं तब भी जीवन की ही बात करता हूँ

जब तुम्हारी मृत आँखों की पलकों पर से
अदृश्य हाथ हटाकर
मैं हर खोखल में रख जाता हूँ
मेरा अधिकारहीन आप्लावित चुम्बन —
मैं तब भी जीवन की ही बात करता हूँ

तुम्हारी मृत आँखों की पलकों से
उभर रहा है वाष्प-गह्वर
और उसे ढँक देना चाहता है
कोई अदृश्य अनसुना हाथ … यह टलमल पहाड़ !

 

इसीलिए इतनी सूख गई हो

बहुत दिनों से तुमने बादलों से बातचीत नहीं की
इसीलिए तुम इतनी सूख गई हो
आओ मैं तुम्हारा मुँह पोंछ दूँ

सब लोग कला ढूँढ़ते हैं, रूप ढूँढ़ते हैं
हमें कला और रूप से कोई लेना-देना नहीं
आओ हम यहाँ बैठकर पल-दो-पल
फ़सल उगाने की बातें करते हैं

अब कैसी हो
बहुत दिन हुए मैंने तुम्हें छुआ नहीं
फिर भी जान गया हूँ
दरारों में जमा हो गए हैं नील भग्नावशेष

देखो ये बीज भिखारियों से भी अधम भिखारी हैं
इन्हें पानी चाहिए बारिश चाहिए
ओतप्रोत अन्धेरा चाहिए

तुमने भी चाहा कि ट्राम से लौट जाने से पहले
इस बार देर तक हो हमारी अन्तिम बात
ज़रूर, लेकिन किसे कहते हैं अन्तिम बात !
सिर्फ़ दृष्टि के मिल जाने पर
समूची देह गल कर झर जाती है मिट्टी पर
और भिखारी की कातरता भी
अनाज के दानों से फट पड़ना चाहती है
आज बहुत दिनों के बाद
हल्दी में डूबी इस शाम
आओ हम बादलों को छूते हुए
बैठें थोड़ी देर ….

 

सैकत

अब आज कोई समय नहीं बचा
ये सारी बातें लिखनी ही पड़ेंगी, ये सारी बातें
कि निस्तब्ध रेत पर
रात तीन बजे का रेतीला तूफ़ान
चाँद की ओर उड़ते-उड़ते
हाहाकार की रुपहली परतों में
खुल जाने देता है सारी अवैधता
और सारे अस्थि-पंजर की सफ़ेद धूल
अबाध उड़ती रहती है नक्षत्रों पर
एक बार, सिर्फ़ एक बार छूने की चाहत लिए.

और नीचे दोनों ओर
केतकी के पेड़ों की कतारों के बीच से होती हुई
भीतर की सँकरी-सी सड़क जिस तरह चली गई है
अजाने अटूट किसी मसृण गाँव की ओर
वह अब भी ठीक वैसी ही है यह कहना भी मुश्किल है
फिर भी यह सजल गह्वर पूरे उत्साह से
रात में यह विराट समुद्र जितनी दूर तक
सुनाता है अपना गर्जन

वहाँ तक मत जागना सोते हुए लोगो !
तुम सोए रहो, सोए रहो
उस गाँव पर बिखर जाए निःशब्द सारी रेत
और तुम्हें भी अलक्षित उठा ले निःसमय
अंक में रख ले अन्धेरे या फिर
अन्धेरे-उजाले की जलसीमा पर
रख ले पद्म के कोमलभेद में
जन्म के होंठ छूकर आ धमके मृत्यु

आज अब और समय नहीं है
सारी बातें आज लिखनी ही पड़ेंगी
ये सारी बातें, ये सारी …!

 

काठ

एक दिन उस चेहरे पर अपरिचय की आभा थी।
हरी महिमा थी, गुल्म थे, नामहीन उजास
आसन्न बीज के व्यूह में पड़ी हुई थी आदिमता
और जन्म की दाईं ओर थी हड्डियाँ, विषाक्त खोपड़ी !
शिराओं में आदिगन्त प्रवहमान डबरे थे
अकेले वशिष्ठ की ओर स्तुति बनी हुई थी आधीरात
शिखर पर गिर रहे थे नक्षत्र और
जड़ों में एक दिन मिट्टी के अपने तल पर थी
हज़ारों हाथों की तालियाँ.
पल्लवित टहनियाँ सीने की छाल से दूर
स्वाधीन अपरिचय में झुककर एक दिन
खोल देते थे फूल.
और आज तुम सामाजिक, भ्रष्ट, बीजहीन
काठ बनकर बैठे हो
अभिनन्दन के अन्धेरे में !

 

 

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