बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part 17

बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part 17

 

सिल्चर

किसने कहा यह मेरा नहीं? नहीं यह तुम्हारा?
यहाँ पाँव रखते ही छिन जाती छिन्नता।
तार मिल जाते सब मेरे तुम्हारे मुहूर्त में।
उठतीं सिहरतीं सब लहरें आनन्द की सिर से ले पाँव तक।

रहता है बहता स्रोत बराक नदी का
पर्वती छाया में जल भीगी आँखों में तुम्हारी
सर्पिल लावण्य वह जमा हुआ
बीच पत्थरों के,
नाचता जैसे कि संयुक्ताक्षर शक्ति के शब्दों में।

छाती में उग आता परिचित पुराना पेड़
विस्मय-सी शाखाएँ रहतीं झूल
इस देश उस देश
समय गढ़ देता शिल्प प्रकृतिमय
हो उठती शिल्पमय प्रकृति!

 

निग्रो बन्धु को चिट्ठी

रिचर्ड, नाम यह तुम्हारा, शब्द मेरा भी।
रिचर्ड रिचर्ड।
रिचर्ड कौन? कोई नहीं? रिचर्ड मेरा शब्द नहीं।

रिचर्ड, नाम यह तुम्हारा, स्वप्न मेरा भी।
रिचर्ड, रिचर्ड।
कौन रिचर्ड? कोई नहीं? रिचर्ड मेरा स्वप्न नहीं।

रिचर्ड, नाम यह तुम्हारा दुःख मेरा भी।
रिचर्ड रिचर्ड।
रिचर्ड कौन? कोई नहीं? रिचर्ड मेरा दुःख नहीं।

 

संगिनी

हाथ पर रखना हाथ सहज नहीं
सारा जीवन देना साथ सहज नहीं
बात लगती यह सहज, जानता न लेकिन कौन
सहज बात होती उतनी सहज नहीं।

पाँवों के भीतर चक्कर मेरे, चक्कर है
उनके नीचे भी, कैसा नशा है यह, इसके तो सभी ऋणी।
झिलमिल-सी दुपहर में भी रहती ही है साथ
गंगा तीर वाली चंडालिनी।

वही सनातन अभ्रुहीना, आसहीना तुम ही तो हो
संगिनी मेरे हर समय की, है ना?
तुम मुझको सुख दोगी यह तो सहज नहीं
तुम मुझको दुःख दोगी यह भी सहज नहीं।

 

घर-2

जो चाहे आना उसको लाना
जो चाहे आना उसको लाना
जो चाहे आना उसको लाना
उसको बुलाना
घर के ही आसपास कितने तो लोग
जो जाए दूर बहुत दूर बहुत दूर
जाए घूमे-फिरे

उसको लाना घर लाना घर लाना
घर के ही पास में है घर के ही लोग
फिर क्यों जाते-जाते उल्टी दिशा में
उल्टी दिशा में
चाहो तुम दल-बाँध घर ही जलाना?

 

कबूतर

उस कबूतर ने पास आ मेरी ही कार्निश के
दिखाया मुझे निज को। इस तरह देखा था क्या कभी?
उसकी कोमलता को जानता। दुपहर को दूर चली जाती
स्वर ध्वनि उसकी पारकर पहाड़ देशकाल
जानी है।

वे सब नहीं हैं सुख रेखाएँ
छाती में उसकी श्वेत, कितने ही नख-क्षत
देख लिए मैंने आज,
जैसे ही उठाए हुए कितने ही मेघ भार
छोटी उस छाती में —
चाहता चुुम्बन वहाँ, मेघों को फोड़कर चाहता
होना वृष्टि, खोलकर डैनों को चाहता झर जाना
मर जाना अन्तिम बार गेरूआ माटी में —
छुऊँगा नहीं उस कबूतर को और कभी आगामी शीत में।

 

ग्रह

इस ग्रह के कोई नहीं हो तुम लगता यह रहता।

मेघों में आलोक। पर्वत की गोद में
हाथों में लिये हुए बैठे हो हरी-हरी रेखाएँ
चाहूँ मैं मुझको ही घेरकर तुम्हारा भी
छाया पथ जाग उठे।

आँखों में सुश्रुवा का भाव जो तुम्हारी
वह आकर समा जाए मेरे शरीर में
बूँद एक बनकर।

फिर तुम बचे कहाँ !
तुम हो बस माटी में पत्थर में
घास के ऊपर सिहरता वृष्टि जल
इस ग्रह के कोई नहीं हो तुम
फिर भी यह ग्रह है तुम्हारा।

 

अब भी मैं वैसी वह

अब भी हैं वे कीर्तन? अब भी वह नाम।
है प्रवाह वैसा ही? अब भी वह राह?
नहीं, नहीं ज्यों की त्यों रहने की थी भी न बात।

पार किये पथ कितने, डैनों को खोल-मोड़,
एक और रूप लिए गाती वह जलवती अब भी तो।
तुमको है देखती? रखती क्या तुम्हें याद?

सोचा यह सब कहाँ, इस दुपहर आया जब
आज यहाँ,
मन में रखकर अपने इतना विश्वास
उठती यह देह जाग, आता हूँ
जब उसके पास।

 

संध्या नदी जल

संध्या नदी जल! छूते हैं दोनों हाथ
स्रोत को तुम्हारे, साक्षी हो।
तर्पण के ऐसे दिन पार कर कितने ही मैदान
आया हूँ पास मैं बैठा हूँ दुःखों के किनारे तुम्हारे
इस भोर बेला में।

हैं वे भी बनकर यवनिका एक
यहीं कहीं जो अब रहे नहीं,
उनकी भी श्वासों को अंजलि बनाकर
मैं बैठा हूँ सोचता सम्बल बस मेरा
है स्थिर हो रहना। सम्बल हैं लता-फूल
अविकल, पथ को घेरे,
संध्या नदी नाम मेरी नदी का है,
तुम हो उसी का तो जल !

काव्य तत्व
कही भी कल क्या यह बात?
सम्भव है। लेकिन नहीं मानता उसे आज।

कल जो था मैं, वहीं हूँ मैं आज भी
इसका प्रमाण दो।
मनुष्य नहीं है शालिग्राम
कि रहेगा एक ही जैसा जीवन भर।
बीच-बीच में आना होगा पास।
बीच-बीच में भरेगा उड़ान मन।
कहा था कल पर्वत शिखर ही है मेरी पसन्द
सम्भव है मुझे आज चाहिए समुद्र ही।

दोनों में कोई विरोध तो है नहीं
मुट्ठी में भरता हूँ पूरा भुवन ही।
क्या होगा कल और आज का योग कर
करूँगा भी तो करूँगा वह बहुत बाद में।

अभी तो रहा हूँ मैं सोच यही —
फुर्ती यह आई कैसे विषम ज्वर में!

 

मिथ्या

यह मुख निर्मल नहीं
मिथ्या लगी इस पर
अच्छा नहीं पास में
जाना तुम्हारे अभी
तुम तो स्नेही सुदक्षिणा
मेघमय धार उतर आती
आज भी आँखों के जल से तुम्हारे
रुद्ध देश भर जाता पुण्य से।

फिर भी मैं दूर चला जाता
यह मुख निर्मल नहीं,
बोधहीन पीला शरीर
जाता थम, तापीं
तुमने दिया बहुत कुछ
मेरा तो समस्त ही
देना अभी बाक़ी।

(तापीं : तपस्विनी)

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