बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part 12

बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part 12

यौवन

दिन और रात
के बीच
परछाइयाँ
चिड़ियों के उड़ान की

याद आती हैं
यूँ भी
हमारी आख़िरी मुलाक़ातें ।

 

तुम

उड़ता हूँ
और भटकता हूँ
दिन भर पथ में ही
सुलगता हूँ

पर अच्छा नहीं लगता
जब तक
लौट कर देख न लूँ कि तुम हो,
तुम ।

 

अख़बार

रोज़
सुबह के अख़बार में
एक शब्द
बर्बरता

अपनी
सनातन अभिधा का
नित नया विस्तार
ढूँढ़ता है ।

 

सपना

ओ पृथ्वी !
अब भी क्यों नहीं टूटती
मेरी नींद

सपनों के भीतर
ऊँचे पहाड़ों की तहों से
झरती हैं पंखुरियाँ

झरती हैं पंखुरियाँ
पहाड़ों से
और इसी बीच
जाग उठते हैं धान के खेत

जब लक्ष्मी घर आएगी
घर आएगी जब लक्ष्मी

वे आएँगे अपनी बन्दूकें और
कृपाण लिए हाथों में, ओ पृथ्वी !

अब भी क्यों नहीं टूटती
मेरी नींद ।

 

नीग्रो दोस्त के नाम एक ख़त

रिचर्ड ! रिचर्ड !!
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे लफ़्ज़ों में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा लफ़्ज़ नहीं है ।

रिचर्ड ! रिचर्ड !!
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे सपनों में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा सपना नहीं है ।

रिचर्ड ! रिचर्ड !!
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे दुख में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा दुख नहीं है ।

Leave a Reply