बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part 10

बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part 10

चाहत का तूफ़ान

इस छोर से उस छोर तक घूमती नि:शब्द निर्जनता में
अन्धेरी शाम की तेज़ अकेली हवा में
तुम उठाती हो अपना
बादलों-सा ठण्डा, चान्द की तरह पाण्डुर
नीरक्त, सफ़ेद चेहरा
विपुल आकाश की ओर।

दूर देस में मैं काँपता हूँ
चाहत की असह्य वेदना से —
तुम्हारे श्वेत पाषाण-सदृश मुख को घेरे
काँपती हैं —
आर्त प्रार्थना में उठी हज़ार उँगलियों की तरह —
बालों की पतली लटें, बिखरी अलकें
अन्धेरी हवा में।

घिर आए बादल अपने ही भार से आकाश के एक कोने में जमा हो गए —
उस पुंज के बीच बार-बार ज़ोर से कौंधती है
कामना की तड़ित् ;
प्रचण्ड आवेग से फेनिल होता प्रेम का अबाध्य प्रवाह
अन्धकार के सीमाहीन अन्तराल और
विचारमग्न, स्थिर धरित्री की घन कान्ति को
अस्थिर करता है।

तुम उठाती हो अपना
बादलों-सा ठण्डा, चान्द की तरह पाण्डुर मुख,
रोते-रोते थककर चुप हुई धरती के उठते-गिरते स्तन,
प्रार्थना में क्लान्त, विकल, दुर्बल, दीर्घ प्रत्याशा के हाथ,
विपुल, विक्षुब्ध आकाश की ओर उठे —
और सबको घेरकर फैला अन्धकार, तुम्हारे विरल केश,
असीम, एकाकी हवा में असंख्य स्वरों वाले वाद्य।

धीरे-धीरे सृष्टि प्रस्तुत होती है, मानो
मर्मभेदी एक मधुर मुहूर्त में दु:सह वज्र बनकर टूटता है उसकी चाहत का बादल
तुम्हारे उद्धत, उत्सुक, प्रसारित, विदारित वक्ष के मध्य
मिलन की पूर्ण प्रेमाकुलता के साथ ―
उसके बाद भीगी, अस्तव्यस्त, भग्न पृथ्वी की गन्दगी साफ़ कर
आता है सुन्दर, शीतल, ममता-भरा विहान

 

 

जन्मदिन

तुम्हारे जन्मदिन पर और क्या दूँगा इस वायदे के सिवा
कि फिर हमारी मुलाक़ात होगी कभी

होगी मुलाक़ात तुलसी चौरे पर, होगी मुलाक़ात बाँस के पुल पर
होगी मुलाक़ात सुपाड़ी वन के किनारे

हम घूमते फिरेंगे शहर में डामर की टूटी सड़कों पर
दहकते दोपहर में या अविश्वास की रात में

लेकिन हमें घेरे रहेंगी कितनी अदृश्य सुतनुका हवाएँ
उस तुलसी या पुल या सुपाड़ी की

हाथ उठाकर कहूँगा, यह रहा, ऐसा ही, सिर्फ़
दो-एक तकलीफ़ें बाक़ी रह गईं आज भी

जब जाने का समय हो आए, आँखों की चाहनाओं से भिगो लूँगा आँख
सीने पर छू जाऊँगा उँगली का एक पंख

जैसे कि हमारे सामने कहीं भी और कोई अपघात नहीं
मृत्यु नहीं दिगन्त अवधि

तुम्हारे जन्मदिन पर और क्या दूँगा इस वायदे के सिवा कि
कल से हर रोज़ होगा मेरा जन्मदिन।

 

कलकत्ता

हे बापजान
कलकत्ता जाकर देखा हर कोई जानता है सब कुछ
सिर्फ़ मैं ही कुछ नहीं जानता
मुझे कोई पूछता नहीं था
कलकत्ता की सड़कों पर भले ही सब दुष्ट हों
ख़ुद तो कोई भी दुष्ट नहीं

कलकत्ता की लाश में
जिसकी ओर देखता हूँ उसके ही मुँह पर है
आदिकाल का ठहरा हुआ पोखर
जिसमें तैरते हैं सड़े शैवाल

ओ सोना बीबी अमीना
मुझे तू बाँधे रखना
जीवन भर मैं तो अब नहीं जाऊँगा कलकत्ता।

 

बौड़म

ख़ूब भले बचे अपन
क़िस्मत ही अच्छी है,
धोखे की दुनिया में
आँखों पे पट्टी है।

किसी को छू लेता हूँ,
पूछता हूँ यारा,
“गली-गली फिरता है
क्यों मारा-मारा?

इससे भला था, सब
परपंच भुलाकर
एक बार बेपरवा’
हँसता ठठाकर।“

सुनकर वे कहते हैं
“कौन मनहूस है?
छुपा-छुपा फिरता है
निश्चय जासूस है।“

हद्द ! बोले कल के
वो छोकरे चिल्लाकर
‘बौड़म’, हमाई ओर
उँगली उठाकर।

बस, तब से बौड़म बन
श्याम बाज़ार के
आसपास रहता हूँ
वही रूप धार के।

 

मुखौटे

तब, जब सब सो जाते
दु:खीजन जग उठता।
आसमान आँखों के आगे झूले
नीचे शहर झूलता, और मकान
तारों जैसे एक दूसरे से मिलते हैं –
रात्रिकाल का निर्जन रस्ता,
गालों पर आँसू की लम्बी रेखा जैसा
समय तैरता जलस्रोत पर,
और
सब कोई जब सोते हों, तब
दिन के मुखौटे उतारकर रख
हिम्मत करके सच्ची-सच्ची बोल।

 

अकेला

कितनी उम्र थी, दिल भी क्या था
पद्मा नदी ने जब दे दी थी मुझे विदा !
आज मन ही मन जानता हूँ कि तुम नहीं, तुम नहीं,
मैं ही ख़ुद को छोड़ आया था आधी रात।

उसी अपराध का फल है, नूरुल, कि तू अकेला
मेरे बग़ैर ही लड़ाई को चला गया
उसी अपराध के कारण आज बैठा-बैठा देख रहा हूँ तुझ
अकेले का दु:ख, मृत्यु, विजय।

 

बना दो भिखारी पर ऐसी गौरी तो नहीं हो तुम

मुझे हासिल करना है? इतनी ज़री बिखेरती, ओ सुन्दरी,
झालरें गिराती दोनों हाथों से!

ग्रहण करोगी मुझे? कभी न देखा इन आँखों
ऐसा अतुल्य प्रेम।

तुम्हारा मृदु हास मेरे लिए दुनिया पाने के आसपास,
तुम्हारे होठों में आणविक छटा की ऊष्मा।

ले जाना है मुझे? किस सूने खेत से?
तुम बनीं आज अन्नपूर्णा, हाय!

समर्पण चाहिए बस तुम्हें, बारी-बारी सब निकालना है –
मेद, मज्जा, दिल, दिमाग़।

उसके बाद चाहती हो मैं घुटने तोड़ सरेआम रास्ते पर बैठूँ
हाथ में अल्मुनिए का कटोरा लेकर.

लपेट लो रेशमी रस्सी, ख़ूब बिखेरो ज़री, सुन्दरी,
रोज़-ब-रोज़ मुझे अपने पैरों के तले लाना चाहो।
बना दो भिखारी, पर
तुम्हारे मन में कभी यह ख़याल नहीं आया
कि ऐसी गौरी तो नहीं हो तुम !

 

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