बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part  5

बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part  5

 

मिथ्या

यह मुख निर्मल नहीं
मिथ्या लगी इस पर
अच्छा नहीं पास में
जाना तुम्हारे अभी
तुम तो स्नेही सुदक्षिणा
मेघमय धार उतर आती
आज भी आँखों के जल से तुम्हारे
रुद्ध देश भर जाता पुण्य से।

फिर भी मैं दूर चला जाता
यह मुख निर्मल नहीं,
बोधहीन पीला शरीर
जाता थम, तापीं
तुमने दिया बहुत कुछ
मेरा तो समस्त ही
देना अभी बाक़ी।

(तापीं : तपस्विनी)

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