बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part  8

बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh Part  8

 

आकण्ठ भिक्षुक

आकण्ठ भिक्षुक, कहो कुछ कानों में
गृहस्थ के, उसकी स्थिरता सब
भंग करो, कार्निश से उसकी
झरा दो प्रपात,

बंशी बजाओ भेद तन मन उसका
गुनगुन नचाओ उसे पथ-पथ पर भीड़ जहाँ
देखो तब भी कितनी बची हुई

उसके शरीर से लगी हुई
मोह-सिक्त मूर्खता!

 

आलस्य

उस सबकी चिन्ता करो नहीं, उस सबका तो कोई अन्त नहीं
छोड़ो, आओ देखो बैठो यहाँ
देखो यह, किसी एक छोटी-सी चीज़ को
और बड़ा करते ही
लगने क्यों लगता है अशालीन

वहाँ दूर भय से वे चले गये दौड़ते माटी में
छाती में तुम्हारी भी होता क्यों कम्पन

आँखों में छाया आलस्य का भार यह
फिर भी क्यों होती यह चाहना
ठीक ठाक सब कुछ है ना !

 

मेघ जैसा मनुष्य

गुज़र जाता है सामने से मेरे वह मेघ जैसा मनुष्य
लगता है छू दें उसे तो झर पड़ेगा जल

गुज़र जाता है सामने से मेरे वह मेघ जैसा मनुष्य
लगता है जा बैठें पास में उसके तो छाया उतर आएगी
वह देगा या लेगा? आश्रय है वह एक, या चाहता आश्रय?

गुज़र जाता है सामने से मेरे वह मेघ जैसा मनुष्य
सम्भव है जाऊँ यदि पास में उसके किसी दिन तो
मैं भी बन जाऊँ एक मेघ।

 

अब भी मैं वैसी वह

अब भी हैं वे कीर्तन? अब भी वह नाम।
है प्रवाह वैसा ही? अब भी वह राह?
नहीं, नहीं ज्यों की त्यों रहने की थी भी न बात।

पार किये पथ कितने, डैनों को खोल-मोड़,
एक और रूप लिए गाती वह जलवती अब भी तो।
तुमको है देखती? रखती क्या तुम्हें याद?

सोचा यह सब कहाँ, इस दुपहर आया जब
आज यहाँ,
मन में रखकर अपने इतना विश्वास
उठती यह देह जाग, आता हूँ
जब उसके पास।

 

संध्या नदी जल

संध्या नदी जल! छूते हैं दोनों हाथ
स्रोत को तुम्हारे, साक्षी हो।
तर्पण के ऐसे दिन पार कर कितने ही मैदान
आया हूँ पास मैं बैठा हूँ दुःखों के किनारे तुम्हारे
इस भोर बेला में।

हैं वे भी बनकर यवनिका एक
यहीं कहीं जो अब रहे नहीं,
उनकी भी श्वासों को अंजलि बनाकर
मैं बैठा हूँ सोचता सम्बल बस मेरा
है स्थिर हो रहना। सम्बल हैं लता-फूल
अविकल, पथ को घेरे,
संध्या नदी नाम मेरी नदी का है,
तुम हो उसी का तो जल !

काव्य तत्व
कही भी कल क्या यह बात?
सम्भव है। लेकिन नहीं मानता उसे आज।

कल जो था मैं, वहीं हूँ मैं आज भी
इसका प्रमाण दो।
मनुष्य नहीं है शालिग्राम
कि रहेगा एक ही जैसा जीवन भर।
बीच-बीच में आना होगा पास।
बीच-बीच में भरेगा उड़ान मन।
कहा था कल पर्वत शिखर ही है मेरी पसन्द
सम्भव है मुझे आज चाहिए समुद्र ही।

दोनों में कोई विरोध तो है नहीं
मुट्ठी में भरता हूँ पूरा भुवन ही।
क्या होगा कल और आज का योग कर
करूँगा भी तो करूँगा वह बहुत बाद में।

अभी तो रहा हूँ मैं सोच यही —
फुर्ती यह आई कैसे विषम ज्वर में!

 

 

अख़बार

रोज़
सुबह के अख़बार में
एक शब्द
बर्बरता

अपनी
सनातन अभिधा का
नित नया विस्तार
ढूँढ़ता है ।

 

सपना

ओ पृथ्वी !
अब भी क्यों नहीं टूटती
मेरी नींद

सपनों के भीतर
ऊँचे पहाड़ों की तहों से
झरती हैं पंखुरियाँ

झरती हैं पंखुरियाँ
पहाड़ों से
और इसी बीच
जाग उठते हैं धान के खेत

जब लक्ष्मी घर आएगी
घर आएगी जब लक्ष्मी

वे आएँगे अपनी बन्दूकें और
कृपाण लिए हाथों में, ओ पृथ्वी !

अब भी क्यों नहीं टूटती
मेरी नींद ।

 

नीग्रो दोस्त के नाम एक ख़त

रिचर्ड ! रिचर्ड !!
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे लफ़्ज़ों में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा लफ़्ज़ नहीं है ।

रिचर्ड ! रिचर्ड !!
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे सपनों में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा सपना नहीं है ।

रिचर्ड ! रिचर्ड !!
रिचर्ड तुम्हारा नाम मेरे दुख में है ।
कौन रिचर्ड ?
कोई नहीं ।
रिचर्ड मेरा दुख नहीं है ।

 

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