बाँसुरी -सोहन लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi Part 1

बाँसुरी -सोहन लाल द्विवेदी  -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi   Part 1

फूल हमेशा मुसकाता

चाहे हवा बहे मतवाली
फूल हमेशा मुसकाता ।
चाहे हवा चले लूवाली
फूल हमेशा मुसकाता ।

बरसे प्यारी ओस मनोहर
फूल हमेशा मुसकाता ।
चाहे ओले पड़ें शीश पर
फूल हमेशा मुसकाता ।

काँटों की नोकों को सहकर
फूल हमेशा मुसकाता।
पत्तों की गोदी में रहकर
फूल हमेशा मुसकाता।

ऊपर रह डालों पर खिलकर
फूल हमेशा मुसकाता ।
नीचे टपक धूल में मिलकर
फूल हमेशा मुसकाता ।

रोना नहीं फूल को आता
फूल हमेशा मुसकाता ।
इसीलिए वह सबको भाता
फूल हमेशा मुसकाता।

 

यह है बसन्त का पहला दिन

कुछ कुछ सुगंध के लेकर कण,
अब देखो बहने लगी पवन,
कुछ कुछ निकले हैं नये सुमन,

यह है बसन्त का पहला दिन !

है कभी कभी आती कोयल,
दो चार बोल गाती कोयल,
फिर चुप हो छिप जाती कोयल,

यह है बसन्त का पहला दिन !

किरणों में है कुछ कुछ लाली,
दूर्वा में कुछ कुछ हरियाली,
दिखलाता कुछ कुछ ख़ुश माली,

यह है बसन्त का पहला दिन !

कुछ दिन लगते हैं अब सुन्दर,
कुछ दिशा दिखाती है मनहर,
यह कौन गया है जादू कर ?

यह है बसन्त का पहला दिन !

 

बसन्ती पवन

जब करने को मैं चला भ्रमण,
तब मिली आज कुछ नई पवन ।

भीनी भीनी इसकी सुगंध,
जिससे भौरे बन जायँ अंध,
यह पवन भरी थी मधुर गंध,

तन हुआ मगन, मन हुआ मगन,
जब मिली सुगंधित नई पवन ।

कुछ कुछ ऐसा तब हुआ ज्ञात-
इसमें सुगंध थी भाँत भाँत,
आसान न सब जानना बात,

बस मीठा था दिशि का कण कण,
यों मिली अनोखी सुखद पवन ।

बौरे रसाल, बौरे कटहल,
कचनार, अनार, शंतरे फल,
फूलों की गिनती नहीं सरल,

मन मस्त हो रहा था छन छन !
यों मिली बसन्ती मधुर पवन ।

 

 

अगर कहीं मैं पैसा होता?

पढ़े-लिखों से रखता नाता,
मैं मूर्खों के पास न जाता,

दुनिया के सब संकट खोता !
अगर कहीं मैं पैसा होता ?

जो करते दिन रात परिश्रम,
उनके पास नहीं होता कम,

बहता रहता सुख का सोता !
अगर कहीं मैं पैसा होता?

रहता दुष्ट जनों से न्यारा,
मैं बनता सुजनों का प्यारा,

सारा पाप जगत से धोता !
अगर कहीं मैं पैसा होता?

व्यर्थ विदेश नहीं मैं जाता,
नित स्वदेश ही में मँडराता,

भारत आज न ऐसे रोता!
अगर कहीं मैं पैसा होता?

 

पहाड़ की चोटी से

यदि पहाड़ की चोटी पर
चढ़कर देखो बच्चो भू पर,
तो अजीब चीजें आयेंगी
तरह तरह की तुम्हें नज़र !

नहीं आदमी देख सकोगे,
चलते फिरते सिर केवल,
दिखा पड़ेंगे तुम्हें अजब से,
चलते ज्यों चींटी के दल !

आँगन से मैदान दिखाते,
जंगल ऐसे जैसे बाग़,
खपरैलों, छप्पर, टीनों ये
दिखा पड़ेंगे जैसे दाग़।

कुत्ता बिल्ली देख न पाओगे,
बंदर की गिनती क्या ?
चकरा जाती आँखें बाहर,
फिर अंदर की गिनती क्या ?

नदी दिखाती नाला जैसी,
झीलें जैसे हों तालाब,
गाँव दिखाता है घर जैसे,
आगे का क्या कहूँ हिसाब ?

ज्यों बौनों का देश बसा हो,
सब बौने जिसकी बातें ?
ऐसा ही लगता आँखों को,
अजब देश की-सी बातें।

 

रेल की खिड़की से

छक छक, फक फक, छक छक, भक भक
है रेल चली जाती धक धक ।

मैं बैठा डिब्बे के अंदर,
जब नज़र डालता हूँ बाहर ।
तो दुनिया अजब नज़र आती,
सब चीजें भगती दिखलाती।

ये पेड़ भगे, ये पात भगे,
जंगल के बड़े जमात भगे।
ये खेत भगे, खलिहान भगे,
लम्बे चौड़े मैदान भगे।
ये गाँव भगे, ये शहर भगे,
दिखलाते पुल औ नहर भगे।

फिर चीजें दिखती मिलती सीं,
ज्यों एक तार में सिलती-सी।
यह एक मील, दूसरा मील,
लो, आया यह तीसरा मील ।
यों मीलों पर सैकड़ों मील,
मिलते पग पग, होती न ढील।

पंजाब गई, बंगाल गई,
यह रेल चली भूपाल गई।
मद्रास गई, नैपाल गई,
यह शिमला नैनीताल गई।

पुल पर चढ़, नभ तत्काल चली,
नीचे नीचे पाताल चली।
पृथ्वी पर धीमी चाल चली,
चढ़ पर्वत उच्च विशाल चली।

यह नदी चली, यह ताल चली,
यह ढाल चली, उत्ताल चली।
टाले न किसी के कहीं टली,
घूमी दुनिया की गली गली!

फिर चीजें दिखती सटती-सी,
आपस में गले लिपटती-सी,
जा खंभे फैले भगे भगे,
वे दिखलाते हैं लगे लगे,

आती है स्टेशन पर स्टेशन,
आ जाता है जंगी जंक्शन,
नज़दीक दिखाते नगर नगर,
हम चलते रहते डगर डगर,

खंभे पर खंभे चढ़ जाते,
पेड़ों पर टीले बढ़ जाते,
झीलों पर जंगल मढ़ जाते,
यों आँखों में हैं गड़ जाते !
यह कलकत्ता तो यह काशी
यह कानपूर तो यह झाँसी,

दिखता है अजब तमाशा-सा
मन घलता दूध बताशा-सा

 

क़लम की आत्मकहानी

है मेरी अति करुण कहानी !
वही मुझे है यहाँ सुनानी !

मैंने बहुत कष्ट है पाया,
इससे मूखी मेरी काया,

मुझे लोग जंगल से लाते,
मात पिता से साथ छुटाते ।

मेरा सुन्दर रङ्ग मिटाते,
काला और कुरूप बनाते,

चाकू से फिर शीश काटकर,
मेरी जीभ छेदते हैं नर !

आगे क्या दूँ अधिक हवाला ?
आखिर मुंह कर देते काला !

किन्तु, भुला यह सभी बुराई,
करती उनकी सदा भलाई !

प्रतिदिन नये लेख लिखती हूँ !
दुश्मन का भी हित करती हूँ !!

 

कौन कहाँ ख़ुश रहता है ?

पेड़ों में ख़ुश रहती चिड़ियाँ,
तालाबों में ख़ुशी मछलियाँ ।
जंगल में ख़ुश हिरन दौड़ते,
उपवन में ख़ुश बहुत तितलियाँ ?

चुहिया बिल में ख़ुश रहती है,
बिल्ली ख़ुश रहती कोने में।
कुत्ते ख़ुश दीखते सड़क पर,
बकरी ख़ुश बन में होने में।

गायें ख़ुश रहती थानों में,
हाथी ख़ुश रहता जंगल में ।
साही औ खरगोश, चौगड़े,
ख़ुश झाड़ी झुरमुट के दल में ।

गिल्ली ख़ुश रहती डालों में,
मकड़ी ख़ुश रहती जाले में।
मेढक क्या ही ख़ुश दिखलाते,
पड़े हुए नाली नाले में !

कोवे घर की मुंड़वाई पर,
रोटी देख देख ख़ुश होते ।
छत के नीचे छिपे कबूतर,
गुटगूँ बोल मज़े में सोते ।

छत्ते में ख़ुश नित मधुमक्खी,
बया झोंझ में मगन दिखाता।
खुंटकढ़वा बबूल में खटखट,
ख़ुश हो अपनी चोंच चलाता ।

माँदों में ख़ुश बड़ी लोमड़ी,
रेगिस्तान ऊँट को भाता !
शेर गरजता बियाबान में,
जहाँ घना जंगल दिखलाता ।

बगुले ख़ुश हैं तालाबों में,
गीध जहाँ मरघट दिखलाता।
गदहे .ख़ुश रहते खेतों में,
जहाँ हरा चारा मिल जाता !

लड़के ख़ुश रहते घर बाहर,
जहाँ कहीं हो खेल तमाशा ।
मुन्ने ख़ुश रहते गोदी पर,
मिलता जाये दूध बताशा ।

दादा ख़ुश रहते दफ़्तर में,
अम्मा ख़ुश रहती आँगन में।
नानी ख़ुशी कहानी कह कह,
टूटी खटिया के बाँधन में ।

 

समुद्रतट

यदि समुद्रतट पर तुम जाओ
तो देखोगे अजब बहार,
जल ही जल दिखलाता इतना
मानो जलमय हो संसार !

बड़ी बड़ी लहरें उठती हैं
मचता रहता हाहाकार,
होता शोर ज़ोर से ज्यों ही
लहरें टकराती हर बार !

रङ्ग बिरंगे घोंघे सीपी
पत्थर पड़े किनारे पर,
लहरें जिन्हें फेंक जाती हैं
दूर दूर से ला-लाकर !

शीतल मन्द पवन बहती है
यहाँ बड़ी ही मनहारी।
जहाँ टहलने को आते हैं
सन्ध्या में सब नर-नारी !

यहाँ ज्वार भाटा आता है
तब श्राती है अजब बहार,
गरज गरज कर पानी आता
लहर लहर हो गया उतार !

अगर ज़रा आगे बढ़कर तुम
लहरों ही में खड़े रहो,
देखोगे लहरों के बल को
मुश्किल है तुम अड़े रहो !!

हैं जहाज़ इनमें लहराते
घूमा करते छहर छहर,
मानो यह घर हो उनका ही
जिसमें उनको कहीं न डर !!

देश विदेशों से आते हैं
तरह तरह के नारी नर,
रङ्ग बिरंगे कपड़े पहने
अजब अजब चीजें लेकर !

अमरीकन अगरेज़ यहूदी
चीनी भी जापानी भी,
तुम्हें यहाँ पर मिल जायेंगे
राजा भी औ रानी भी।

यदि समुद्र तुम लखना चाहो
कभी बम्बई को जाओ,
मैं तुमको क्या क्या बतलाऊँ
तुम खुद सभी देख आओ!

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