बाँसुरी -सोहन लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi Part 3

बाँसुरी -सोहन लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi Part 3

 

बादल

बादल भी बड़े खिलाड़ी हैं
मानो कुछ इनको नहीं काम।
बस, आठ पहर, चौबिस घंटे,
खेला करते हैं सुबह शाम !

इनको है नींद नहीं आती
थकते भी इनके नहीं पैर,
जब देखो तब बन सैलाने
करते रहते हैं सदा सैर !

पल में हैं अगर पहाड़ी में,
तो पल ही में हैं खाड़ी में,
पल में उड़ते हैं पेड़ों में
तो पल में उड़ते झाड़ी में !

चढ़ रोज़ हवा के घोड़े पर
ले करके बिजली का कोड़ा,
दौड़ा करते दुनिया भर में
हूँढा करते अपना जोड़ा !

ये कभी तैरते सागर पर
तो कभी तैरते नहरों में,
है इन्हें बड़ा अच्छा लगता
खेलना किलकती लहरों में।

इनको है अजब शरीर मिला
जो चाहा रूप बनाते ये,
जितना चाहा फैलाते ये
जितना चाहा सिकुड़ाते थे।

बिल्ली, कुत्ता, चूहा, बन्दर,
जो चाहा शकल बना लेते,
हाथी, घोड़ा, खरगोश, ऊँट,
जो चाहा नकल बना लेते ।

खेला करते ये झरनों से
सूरज की सुन्दर किरनों से,
खेला करते ये पत्तों से
फूलों से, वन के हिरनों से !

जाकर समुद्र की लहरों से
ये ऊधम बहुत मचाते हैं,
भर लाते उसका सारा जल
बिजली चमका डरवाते हैं।

मिल जाता इनको वायुयान
तो उसको बहुत तंग करते,
उसको भटकाते इधर उधर
मीलों तक दौड़ संग करते ।

जब होते हैं ये ख़ुशी कभी
तब रिमझिम बूंदें बरसाते,
जब होते ये नाराज़ कभी
तब ओले पड़ पड़ बरसाते ।

ये नहीं चाँद से डरते हैं,
ये नहीं मूर्य से डरते हैं,
ढक लेते हैं उनको पल में
ये बड़ा अँधेरा करते हैं।

पल में ये हैं नीचे आते,
लहराते झुक झुक रुक भू पर,
पल में ये बनते घन घमण्ड,
घहराते हैं नभ के ऊपर ।

पहना करते हैं कभी कभी
कपड़े रङ्गीन बड़े न्यारे,
तब हरे लाल नीले पीले
ये दिखलाते प्यारे प्यारे ।

सबसे ज्यादा है मौज इन्हें;
जी चाहा वहीं झूम आते;
इंगलैंड, जर्मनी, अमरीका,
ये बातोंबात घूम आते।

ये हो आये जापान, चीन,
देखी लन्दन की चहल पहल,
इनने देखा न्यूयार्क जहाँ
चालीस खंड का खड़ा महल !

यदि तुम इनसे मिलना चाहो
तो जाओ कभी मसूरी में,
ये लिपट गले से जायेंगे
जो आज दिखाते दूरी में।

मुमकिन है तुमको बतला दें
कोई ऐसा जादू मन्तर,
ये मज़े निराले लूट सको
तुम भी ऐसे बादल बनकर !!

 

अगर कहीं बादल बन जाता ?

अगर कहीं बादल बन जाता,
तो मैं जग में धूम मचाता !

कड़कड़ गड़गड़ कड़कड़ गड़गड़,
घड़घड़ गड़गड़ कड़कड़ गड़गड़,
करता जग में भारी गर्जन
कपते हाथी शेरों के मन !

मैं दुनिया का दिल दहलाता,
अगर कहीं बादल बन जाता ?

नहीं ज़रा आँधी से डरता,
मैं ओलों की वर्षा करता,
उमड़ घुमड़ नभ में छा जाता
जल-धारा प्रतिपल बरसाता।

जल थल सागर एक बनाता!
अगर कहीं बादल बन जाता ?

सागर से सब जल भर लाता,
सारी पृथ्वी पर बरसाता,
जब मैं अपना क्रोध दिखाता,
पल भर ही में सिंधु सुखाता,

मैं दसरा अगस्त कहाता !
अगर कहीं बादल बन जाता ?

सूरज, चन्द्र और ये तारे,
रहते मेरे वश में सारे,
जब चाहता जिसे ढक लेता
कभी न बाहर आने देता !

जग में अंधकार घिर जाता !
अगर कहीं बादल बन जाता ?

किन्तु, शक्ति पाकर मैं इतनी,
सेवा करता बनती जितनी !
कभी नहीं मद में इतराता
दीन दुखी का दुःख मिटाता।

मैं सुख की समीर लहराता !
अगर कहीं बादल बन जाता ?

 

उग रही घास

उग रही घास, उग रही घास ।

कल चावल चावल दीख पड़ी,
तो अंगुल भर है आज खड़ी,
कल होगी जैसे बड़ी छड़ी,

हरियाली लाती आस पास !
उग रही घास, उग रही घास ।

किस समय कहाँ कब आती है ?
कुछ बात न जानी जाती है !
गुप चुप गुप चुप छा जाती है,

उगती है घुलमिल पास पास !
उग रही घास, उग रही घास ।

गिरती नन्हीं बँदें सुन्दर,
तब घास दिखाती है मनहर !
लहराती झोंके खा खाकर,

खिल उठती हैं आँखें उदास!
उग रही घास, उग रही घास ।

उजड़े में चमन बसाती है,
यह नंदन बाग लगाती है,
यह प्रभु की याद दिलाती है।

यह उसकी करुणा का विकास !
उग रही घास, उग रही घास ।

 

मोर

है मोर मनोहर दिखलाता !
यह किसका हृदय न ललचाता ?

चलता कैसा सिर ऊँचा कर ?
मस्ती से धीरे पग धर धर ।
सिर पर है ताज छटा लाता
है मोर मनोहर दिखलाता !

गर्दन इसकी प्यारी प्यारी,
सुन्दर सुन्दर न्यारी न्यारी।
इसका रंग है कितना भाता?
है मोर मनोहर दिखलाता !

जब घिर आती हैं घटा घोर,
तब मोर मचाता बड़ा शोर ।
आनन्द बहुत ही सरसाता,
है मोर मनोहर दिखलाता !

जब वन में अपने पर पसार,
यह नाचा करता है अपार ।
तब कितना मन को ललचाता,
है मोर मनोहर दिखलाता !

यह है वन का शोभा सिंगार,
इससे है उपवन की बहार ।
यह पग पग छवि को छिटकाता,
है मोर मनोहर दिखलाता !

मीठी मीठी इसकी अवाज़,
इस पर है इसको बड़ा नाज़ ।
जब जी आता तब यह गाता,
है मोर मनोहर दिखलाता !

नीले पीले बैंजनी लाल,
रेशम से सुन्दर सुघर बाल ।
इसका रंग अजब रंग लाता,
है मोर मनोहर दिखलाता।

इतना सुन्दर इतना मनहर ?
है और नहीं पंछी भू पर!
जो दिल को इतना बहलाता ।
है मोर मनोहर दिखलाता !

 

शरद्ऋतु

पहन चाँदनी की साड़ी तन
आई खूब शरदऋतु बनठन ।

कैसा गोरा रंग निराला ?
छाया चारों ओर उजाला !

नीले नभ में सुन्दर तारे,
छिटक गये मोती से प्यारे ।

तालाबों में कोकाबेली,
बागों में खिल उठी चमेली!

दिवस सुनहला, रात रुपहली,
बनी शरद क्या खूब दुपहली!

हवा बहुत ही सुख उपजाती,
मीठी मीठी ख़ुशबू लाती !

अब नभ में बादल न दिखाते,
बेखटके रवि रथ दौड़ाते ।

मिटा चाँद को भी अब खटका
देता रोज चाँदनी छिटका।

पृथ्वी निर्मल सागर निर्मल,
गिरवर निर्मल, सरवर निर्मल,

हुआ शरद का क्या ही आना ?
सबने पहना निर्मल बाना !

 

दीवाली

हर घर, हर दर, बाहर, भीतर,
नीचे ऊपर, हर जगह सुघर,
कैसी उजियाली है पग-पग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

छज्जों में, छत में, आले में,
तुलसी के नन्हें थाले में,
यह कौन रहा है दृग को ठग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

पर्वत में, नदियों, नहरों में,
प्यारी प्यारी सी लहरों में,
तैरते दीप कैसे भग-भग!
जगमग जगमग जगमग जगमग!

राजा के घर, कंगले के घर,
हैं वही दीप सुंदर सुंदर!
दीवाली की श्री है पग-पग,
जगमग जगमग जगमग जगमग!

Leave a Reply