बाँसुरी (ओटक्कुष़ळ)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

बाँसुरी (ओटक्कुष़ळ)-जी. शंकर कुरुप-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita G. Sankara Kurup

 

लीला-भाव से जीवित गीतों को गाने वाले
दिशा और काल की सीमाओं से निर्बंध हे महामहिमामय !
मैं जनमा था अज्ञात-अपरिचित
कहीं मिट्टी में पड़े-पड़े नष्ट हो जाने के लिये,
किन्तु तेरी वैभवशालिनी दया ने
मुझे बना दिया बाँसुरी
चराचर को आनन्दित करनेवाली ।
तू ने अपनी सांस की फूँक से
उत्पन्न कर दी है प्राणों की सिहरन
इस निःसार खोखली नली में ।

मन को मगन कर देने वाले
अखिल विश्व के अनोखे गायक !
तू ही तो है जो मेरे अन्दर गीत बनकर बसा है;
अन्यथा क्या बिसात थी इस तुच्छ जड़ वस्तु की
किंचित भी कर सकती राग-आलाप
इस प्रकार हर्षोल्लास से भरकर ।

मन्द हास का मनोरम नवल-धवल फेन,
प्रेम प्रवाह की कलकल मन्द्र ध्वनि,
मानव अहंकार की उद्दाम लहरों का उछाल,
अश्रुसिक्त नेत्रों के नीले कमल,
दैन्य-दारिद्र्य के वर्षाकालीन मेघॊं की काली छाया,
सांसारिक पापों के भँवर जाल
–इन सब को साथ लिये-लिये बहती रहे
मेरे अन्दर की संगीत कल्लोलिनी यह सरिता
हे प्रभु !

हो सकता है कि कल यह बंशी
मूक होकर काल की लम्बी कूड़ेदानी में गिर जाये
या यह दीमकों का आहार बन जाये, या यह
मात्र एक चुटकी राख के रूप में परिवर्तित हो जाये ।
तब कुछ ही ऐसे होंगे जो शोक-निःश्वास लेकर
गुणों की चर्चा करेंगे;
लेकिन लोग तो प्रायः बुराइयों के ही गीत गायेंगे ।
जो भी हो, मेरा जीवन तो तेरे हाथों समर्पित होकर
सदा के लिये आनन्द-लहरियों में तरंगित हो गया,
धन्य हो गया !

-१९२९

 

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