बहुत याद आती है लालटेन-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

बहुत याद आती है लालटेन-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

कच्चे कमरों में बहुत कुछ था
रौशनी के बिना
सूरज छिपता तो
संध्या समय मन डूबता।
प्रकाश तो ख़र्च
हो जाता था शाम के खेल में।
खाली पड़े खेतों में खिदो-खुंडी के दौर चलते
गोबर-कूड़े में खिदो (गेंद) खोती
तो शिकारियों की तरह ढूंढते फिरते।
घर आते तो माँ कहती
पहले नहाओ
स्कूल का निपटाओ
खाना तभी मिलेगा।

दिए की लौ झूमती
पतंगे नाचते इर्द-गिर्द।
एक ही दिया रसोई में जलता।
चौंका-बर्तन समेटकर ही
दिया मिलता कांपता-कांपता।
नींद आँखे कब्जा डेरे डाल लेती
शब्द आगे-आगे, मैं पीछे-पीछे।
दिया दुश्मन सा लगता।
घर में मेज़ नहीं थी
ऊंची सेल्फ पर जगमगाता
ज्ञान दूत यमदूत लगता
नींद का बैरी।

दिए को बढ़ा माँ कहती
अब सो जा,
सुबह उठ जाना पशु निआरने के समय।

फिर जब घर में लालटेन आई
घर रौशन हो उठा
पिता जी कहते
अब तो चींटी भी चलती दिखती है।
प्रकाश में किताबें कहती
आजा बातें करें
पन्ना-पन्ना शब्द-शब्द
पंक्ति दर पंक्ति।
मिट्टी का तेल जलता तो काला धुँआ
नांक में घुसता कड़वा-कसैला सा।
चिमनी में कालिख जमती
तो दादी जी
चुन्नी के फ़टे कपड़े से साफ करते।
धुंधले अक्षर जगमग करते।
नूर-सरोवर में सपने तैरते।
कच्चे आँगन में इच्छाएं उगती
हिम्मत के पानी से उन्हें माँ-बाप सींचते
बड़े बहन भाई पक्के दूध को विश्वास जामण लगा जमाते।
लालटेन ने मेरा संसार बदल दिया।
इसके आसपास जगने से
मुझे सुंदर सपने आते।
सोए को फिर जगाते।
प्रकाश दोस्त बन गया
लालटेन के आने से।

बिजली आई तो पिता जी ने
दूर खड़े हो कर डंडे से जगाई
किसी ने कहा था
हरनाम सिंह पास मत जाना
पकड़ लेती है ये डायन।
तब पता ही नहीं था कि
अंधेरा कितना शातिर है
इंसान के रूप में आता है
भोले लोगों को डराता है।
प्रकाश नहीं सहता
भ्रमजाल फ़ैलता है।
बिजली के लट्टू से
कितना कुछ निकला
ग़ज़ल दर ग़ज़ल रौशनी की लड़ी।
इसने ही हमारी उंगलियां पकड़ी
माथे पर गहरी लकीरें जड़ी।
अब हर कमरे में दो-दो तीन-तीन
ट्यूबें जगती,
बल्ब जगमगाते
पर ख्वाब नहीं आते।
कंक्रीट कितना बेरहम जंगल है
कमरों में कैद कर देता है
सितारों से नहीं मिलने देता
लालटेन से कितना कुछ
मिला मिलाया छीन है लेता
संयुक्त-परिवार सांझे आदर्श और सपने।
छतों से जुड़ी छतें
बातें हुंगारे, टिमटिमाते तारे।
बड़ा जालिम है रूखा सूखा संसार।
कच्चे आँगन, दिए लालटेनें
और भी बहुत कुछ भुला देता है।
सपने जड़ से सूखा देता है।
धरती आकाश भुला देता है।
बिल्कुल खाली कर देता है
सबकुछ होते हुए भी।

 

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