बहुत छोटी जगह-व्यक्तिगत-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

बहुत छोटी जगह-व्यक्तिगत-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

बहुत छोटी जगह है घर
जिसमें इन दिनों
इजाज़त है मुझे

चलने फिरने की
फिर भी बड़ी
गुंजाइश है इसमें

तूफानों के घिरने की
कभी बच्चे
लड़ पड़ते हैं

कभी खड़क उठते हैं
गुस्से से उठाये-धरे
जाने वाले
बर्तन
घर में रहने वाले
सात जनों के मन

लगातार
सात मिनिट भी
निश्चिंत नहीं रहते

कुछ-न-कुछ
हो जाता है
हर एक के मन को
थोड़ी-थोड़ी ही
देर में
मगर

तूफ़ानों के
इस फेर में पड़कर भी
छोटी यह जगह

मेरे चलने फिरने लायक
बराबर बनी रहती है

यों झुकी रहती है
किसी की आँख
भृकुटी किसी की तानी रहती है
मगर सदस्य सब
रहते हैं मन-ही-मन
एक-दूसरे के प्रति

मेरे सुख की गति इसलिए
अव्याहत है

कुंठित नहीं होती
इस छोटी जगह में
जिसे

घर कहते हैं
और सिर्फ जहाँ
इन दिनों

चलने फिरने की
इजाज़त है
मुझे!

 

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