बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की-कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की
सौ बात बन गई है फ़िराक़ एक बात की

साज़-नवा-ए-दर्द हिजाबात-ए-दहर में
कितनी दुखी हुई हैं रगें काएनात की

यूँ फ़र्त-ए-बे-ख़ुदी से मोहब्बत में जान दे
तुझ को भी कुछ ख़बर न हो इस वारदात की

शाम-ए-अबद को जल्वा-ए-सुब्ह-ए-बहार दे
रूदाद छेड़ ज़िंदगी-ए-बे-सबात की

इस बज़्म-ए-बे-ख़ुदी में वजूद-ए-अदम कहाँ
चलती नहीं है साँस हयात-ओ-ममात की

सौ दर्द इक तबस्सुम-ए-पिन्हाँ में बंद हैं
तस्वीर हूँ ‘फ़िराक़’ नशात-ए-हयात की

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