बहन नानकी भाई को तलाशती-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

बहन नानकी भाई को तलाशती-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

बहन नानकी पूछती फिरती
इस शहर में कितने समय से
दिन निकला शामें ढलीं
सुल्तानपुरे की गलियों में से
सूरज भी अपने घर चला
वृक्षों ने समेट ली छाया…।
वीरन नहीं आया…।

पाँच सदियों से आधी और होने को आए।
सोए लोगों को बहुत जगाए।
आदमखोर शेरों, चैधरियों ने फिर
नाका सब जगह लगाया।
वीरन नहीं आया।

उसने हमें जहाँ से मोड़ा।
भ्रम पात्र जो जो तोड़ा।
उसी राह पर उलझे जहाँ से
वर्जा और समझाया।
नानक नहीं आया।

धरती कागज़ पड़ा प्रतीक्षित दिखे।
आए लौट कर शबद लिखे।
खींच जाए फिर नई चिंघाटी
माँ तृप्ता का जाया।
नानक नहीं आया…।

बेईं* से उसने पूछा जाकर।
कहाँ गया तेरे जल में नहा कर।
एक ओंकार शब्द का प्रहरी
कौन से वतन सिधाया।
नानक नहीं आया…।

कान फोड़ू ढोल ढमक्के।
पापी मन भी धुन के पक्के।
कण मात्र भी न हिलते थोड़ा
वृथा जन्म गँवाया।
नानक नहीं आया….।

ठौर ठौर पर तंबू और कनातें।
पहले से काली रातें।
दिन भी जैसे मटमैला पन्ना
मन परदेस सिधाया।
नानक नहीं आया…।

मिलजुल कर सब चोरों यारों।
खोटे मन के ठेकेदारों।
ज्ञान गोष्ठी, बेंची कविता
जिसके हाथ जो आया।
नानक नहीं आया…।

न यह बाबर काबुल से धाया।
न ही फौज़ें साथ ले आया।
फिर भी ले गया बोल और बाणी
सोना रेत मिलाया।
नानक नहीं आया।
वीरन नहीं आया।

*एक नदी।

 

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