बस!-प्रदीप सिंह-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Pradeep Singh

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सपने
टूट ही जाते हैं

पलकों की
महीन परछती पर
अपनी जगह नहीं बना पाते

असल में
कई सपने बहुत बड़े होते हैं
वज़नी भी

वो गिर जाते हैं
और
टूट जाते हैं

उनके गिरने से
जो गड्ढा बनता है
वो कभी नहीं भरता।

 

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