बसंत-बोरिस पास्तरनाक-देशान्तर-धर्मवीर भारती-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dharamvir Bharati 

बसंत-बोरिस पास्तरनाक-देशान्तर-धर्मवीर भारती-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dharamvir Bharati

मैं बाहर सड़क पर से आ रहा हूँ बसंत जहाँ
चिनार का वृक्ष अचरज में खड़ा है, जहाँ विस्तार हिम्मत हार बैठा है
और इमारत भयभीत खड़ी है कि कहीं गिर न पड़े
जहाँ हवा नीली है, मैले कपड़ों के बण्डल जैसी
अस्पताल छोड़ते हुए रोगी के हाथों में-
जहाँ शाम खाली सी है: एक तारा कोई कहानी कहना शुरू करता है
और बीच में कोई बोल देता है, उत्कंठित नेत्रों की पांतों पर पाँतें
घबरा जाती है, इंतज़ार करती हुई उस सत्य का जिसे
वे कभी न जान पाएंगी, उनकी अथाह दृष्टि खाली है

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