बलराम-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar 

बलराम-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

 

 बलराम

उलटा लेट कुहनियों के बल,
धरे वेणु पर ठोड़ी,
कनू कुंज में आज अकेला,
चिन्ता में है थोड़ी ।

सुबल, विशाल, अंशु ओजस्वी,
वृषभ, वरूथप, आओ;
यमुना-तट, वट-तले बैठकर
कुछ मेरी सुन जायो ।

खेल-कूद में ही न अरे, हम
सब अवसर खो देंगे;
भावी जीवन के विचार भी
कुछ निश्चित कर लेंगे ।

रखते हो तो दिखलायो कुछ
आभा उगते तारे,
ओज, तेज, साहस के दुर्लभ
दिन हैं यही हमारे ।

जावेंगे अवश्य हम अपने
प्रिय पितरों के पथ से;
किन्तु चक्र तो नहीं फंसेंगे;
पूछेंगे निज रथ से ।

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