बरवै भक्तिपरक -रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahim Barvai Bhaktiparak PART 1

बरवै भक्तिपरक -रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahim Barvai Bhaktiparak

बन्‍दौ विघन-बिनासन, ऋधि-सिधि-ईस ।
निर्मल बुद्धि-प्रकासन, सिसु ससि सीस ।।1।।

सुमिरौ मन दृढ़ करकै, नन्‍दकुमार ।
जे वृषभान-कुँवरि कै प्रान-अधार ।।2।।

भजहु चराचर-नायक, सूरज देव ।
दीन जनन सुखदायक, तारन एव ।।3।।

ध्‍यावौ सोच-बिमोचन, गिरिजा-ईस ।
नागर भरन त्रिलोचन, सुरसरि-सीस ।।4।।

ध्‍यावौं विपद-विदारन सुअन-समीर ।
खल दानव वनजारन प्रिय रघुवीर ।।5।।

पुन पुन बन्‍दौ गुरु के, पद जलजात ।
जिहि प्रताप तैं मन के तिमिर बिलात ।।6।।

करत घुम‍ड़ घन-घुरवा, मुरवा रोर ।
लगि रह विकसि अँकुरवा, नन्‍दकिसोर ।।7।।

बरसत मेघ चहूँ दिसि, मूसरधार ।
सावन आवन कीजत, नन्‍दकुमार ।।8।।

अजौं न आये सुधि के, सखि घनश्‍याम ।
राख लिये कहुँ बसि कै, काहू बाम ।।9।।

कबलौं रहिहै सजनी, मन में धीर ।
सावन हूँ नहिं आवन, कित बलबीर ।।10।।

घन घुमड़े चहुँ ओरन, चमकत बीज ।
पिय प्‍यारी मिलि झूलत, सावन तीज ।।11।।

पीव पीव कहि चातक, सठ अधरात ।
करत बिरहिनी तिय के, हित उतपात ।।12।।

सावन आवन कहिगे, स्‍याम सुजान ।
अजहुँ न आये सजनी, तरफत प्रान ।।13।।

मोहन लेउ मया करि, मो सुधि आय ।
तुम बिन मीत अहर-निसि, तरफत जाय ।।14।।

बढ़त जात चित दिन-दिन, चौगुन चाव ।
मनमोहन तैं मिलवौ राखि क दॉंव ।।15।।

मनमोहन बिन देखे, दिन न सुहाय ।
गुन न भूलिहौं सजनी, तनक मिलाय ।।16।।

उमिड़-उमिड़ घन घुमड़े दिसि बिदिसान ।
सावन दिन मनभावन, करत पयान।।17।।

समुझत सुमुखि सयानी, बादर झूम ।
बिरहिन के हिय भभकत तिनकी धूम ।।18।।

उलहे नये अँकुरवा, बिन बलबीर ।
मानहु मदन महिप के बिन पर तीर ।।19।।

सुगमहि गातहि का रन जारत देह ।
अगम महा अति पान सुघर सनेह ।।20।।

मनमोहन तुव मूरति, बेरिझवार ।
बिन पयान मुहि बनिहै, सकल विचार ।।21।।

झूमि झूमि चहुँ ओरन, बरसत मेह ।
त्‍यों त्‍यों पिय बिन सजनी, तरफत देह ।।22।।

झूँठी झूँठी सौंहैं हरि नित खात ।
फिर जब मिलत मरू के, उतर बतात ।।23।।

डोलत त्रिबिध मरुतवा, सुखद सुढार ।
हरि बिन लागत सजनी, जिमि तरवार ।।24।।

कहियो पथिक सँदेसवा, गहि कै पाय ।
मोहन तुम बिन तनकहु, रह्यो न जाय ।12511

जब ते आयौ सजनी, मास असाढ़ ।
जानी सखि वा तिय के, हिय की गाढ़ ।।26।।

मनमोहन बिन तिय के, हिय दुख बाढ़ ।
आयौ नन्‍द-ढोठनवा, लगत असाढ़ ।।271।

वेद पुरानबखानत, अधम-उधार ।
केहि कारन करुनानिधि, करत विचार ।।28।।

लगत असाढ़ कहत हो, चलन किसोर ।
घन घुमड़े चहुँ ओरन, नाचत मोर ।।29।।

लखि पावस ऋतु सजनी, पिय परदेस ।
गहन लग्‍यौ अबलनि पै, धनुष सुरेस ।।30।।

बिरह बढ्यौ सखि अंगन, बढ़यौ चबाव ।
कर्यौ निठुर नन्‍दन्‍दन, कौन कुदाव? ।।31।।

भज्‍यो किते न जनम भरि, कितनी जाग ।
संग रहत या तन की, छाँही भाग ।।32।।

भज रे मन नंदनन्‍दन, बिपति बिदार ।
गोपी जन-मन-रंजन, परम उदार ।।33।।

जदपि बसत है सजनी, लाखन लोग ।
हरि बिन कित यह चित को, सुख संजोग ।।34।।

जदपि भई जल-पूरित, छितव सुआस ।
स्‍वाति बूँद बिन चातक, मरत पिआस ।।35।।

देखन ही को निस दिन, तरफत देह ।
यही होत मधुसूदन, पूरन नेह? ।।36।।

कब ते देखत सजनी, बरसत मेह ।
गनत न चढ़े अटन पै, सने सनेह ।।37।।

बिरह बिथा ते लखियत, मरिबौ भूरि ।
जौ नहिं मिलिहै मोहन, जीवन मूरि ।।38।।

ऊधो भलो न कहनौ, कछु पर पूठि ।
साँचे ते भे झूठे, साँची झूठि ।।39।।

भादों निस अँधिअरिया घर अँधिआर ।
बिसर्यो सुघर बटोही, शिव आगार ।।40।।

हौं लखिहौं री सजनी, चौथ-मयंक ।
दखौं केहि विधि हरि सों लगै कलंक ।।41।।

इन बातन कछु होत न कहो हजार ।
सब ही तैं हँसि बोलत, नंद-कुमार ।।42।।

कहा छलत हो ऊधो, दै परतीति ।
सपनेहू नहिं बिसरै, मोहन-मीति ।।43।।

बन उपवन गिरि सरिता, जिती कठोर ।
लगत दहे से बिछुरे, नंदकिसोर ।।44।।

भलि भलि दरसन दीनेहु, सब निसि-टारि ।
कैसे आवन कीनेहु, हौं बलिहारि ।।45।।

आदिहि ते सब छुटि गा, जग ब्‍यौहार ।
ऊधो अब न तिनौ भरि, रही उधार ।।46।।

घेर रह्यौ दिन रतियाँ, बिरह बलाय ।
मोहन की वह बतियाँ, ऊधो हाय! ।।47।।

नर नारी मतवारी, अचरज नाहिं ।
होत विटप हू नाँगे फागुन माँहि ।।48।।

सहज हँसोई बातें, होत चबाइ ।
मोहन को तनि सजनी, दै समुझाइ ।।49।।

ज्‍यों चौरासी लख में, मानुष देह ।
त्‍यों ही दुर्लभ जग में, सहज सनेह ।।50।।

मानुष तन अति दुर्लभ, सहजहि पाय ।
हरि-भजि कर सत संगति, कह्यौ जताय ।।51।।

अति अद्भूत छबि सागर, मोहन गात ।
देखत ही सखि बूड़त, दृग जलजात ।।52।।

निमरेही अति झूठौ, साँवर गात ।
चुभ्‍यौ रहत चित को धौं, जानि न जात ।।53।।

बिन देखे कल नाहि न, इन अँखियान ।
पल पल कटत कलप सौं, अहो सुजान ।।54।।

जब तक मोहन झूँठी, सौंहें खात ।
इन बातन ही प्‍यारे, चतुर कहात ।।55।।

ब्रज-बासिन के मोहन, जीवन-प्रान ।
ऊधो यह सँदेसवा, अकह कहान ।।56।।

मोहि मीत बिअन देखे, छिन न सुहात ।
पल पल भरि भरि उलझत, दृग जलजात ।।57।।

जब ते बिछुरे मितवा, कहु कस चैन ।
रहत भर्यो हिय साँसन, आँसुन नैन ।।58।।

कैसे जीवत कोऊ, दूरि बसाय ।
पल अन्‍तर हू सजनी, रह्यो न जाय ।।59।।

 

 

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