बरवै भक्तिपरक -रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahim Barvai Bhaktiparak PART 2

बरवै भक्तिपरक -रहीम -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahim Barvai Bhaktiparak PART 2

जान कहत हों ऊधो, अवधि बताइ ।
अवधि अवधि लों दुस्‍तर, परत लखाइ ।।60।।

मिलन न बनिहै भाखत, इन इक टूक ।
भये सुनत ही हिय के, अगनित टूक ।।61।।

गये हेरि हरि सजनी, बिहँस कछूक ।
तब ते लगनि अगिनि की, उठत भबूक ।।62।।

मनमोहन की सजनी, हँसि बतरान ।
हिय कठोर कीजत पै, खटकत आन ।।63।।

होरी पूजत सजनी जुर नर नारि ।
हरि बिनु जानहु जिय में, दई दवारि ।।64।।

दिस बिदसान करत ज्‍यों, कोयल कूक ।
चतुर उठत है त्‍यों त्‍यों, हिय में हूक ।।65।।

जब तें मोहन बिछूरे, कछु सुधि नाहिं ।
रहे प्रान परि पलकनि, दृग मग माहिं ।।66।।

उझकि उझकि चित दिन दिन, हेरत द्वार ।
जब ते बिछुरे सजनी, नन्‍दकुमार ।।67।।

जक न परत बिन हेरे, सखिन सरोस ।
हरि न मिलत बसि नेरे, यह अफसोस ।।68।।

चतुर मया करि मिलिहौं, तुरतहिं आय ।
बिन देखे निसबासर, तरफत जाय ।।69।।

तुम सब भाँतिन चतुरे, यह कल बात ।
होरी से त्‍यौहारन, पीहर जात ।।70।।

और कहा हरि कहिये, धनि यह नेह ।
देखन ही को निसदिन तरफत देह ।।71।।

जब ते बिछुरे मोहन, भूख न प्‍यास ।
बेरि बेरि बढ़ि आवत, बड़े उसास ।।72।।

अन्‍तरगत हिय बेधत, छेदत प्रान ।
विष सम परम सबन तें, लोचन बान ।।73।।

गली अँधेर मिल कै, रहि चुपचाप ।
बरजोरी मनमोहन, करत मिलाप ।।74।।

सास ननद गुरु पुरजन, रहे रिसाय ।
मोहन हू अस निसरे, हे सखि हाय! ।।75।।

उन बिन कौन निबाहै, हित की लाज ।
ऊधो तुमहू कहियो, धनि ब्रजराज ।।76।।

जेहिके लिये जगत में बजै निसान ।
तेहिते करे अबोलन, कौन सयान ।।77।।

रे मन भज निस बासर, श्री बलबीर ।
जे बिन जॉंचे टारत, जन की पीर ।।78।।

बिरहिन को सब भाखत, अब जनि रोय ।
पीर पराई जानै, तब कहु कोय ।।79।।

सबै कहत हरि बिछुरे, उर धर धीर ।
बौरी बाँझ न जानै, ब्‍यावा पीर ।।80।।

लखि मोहन की बंसी, बंसी जान ।
लागत मधुर प्रथम पै, बेधत प्रान ।।81।।

कोटि जतन हू फिरतन बिधि की बात ।
चकवा पिंजरे हू सुनि बिमुख बसात ।।82।।

देखि ऊजरी पूछत, बिन ही चाह ।
कितने दामन बेचत, मैदा साह ।।83।।

कहा कान्‍ह ते कहनौ, सब जग साखि ।
कौन होत काहू के, कुबरी राखि ।।84।।

तैं चंचल चित हरि कौ, लियौ चुराइ ।
याही तें दुचिती सी, परत लखाइ ।।85।।

मी गुजरद ई दिलरा, बेदिलदार ।
इक इक साअत हम चूँ, साल हज़ार ।।86।। (फ़ारसी)

नवनागर पद परसी, फूलत जौन ।
मेटत सोक असोक सु, अचरज कौन ।।87।।

समुझि मधुप कोकिल की, यह रस रीति ।
सुनहु श्‍याम की सजनी, का परतीति ।।88।।

नृप जोगी सब जानत, होत बयार ।
संदेसन तौ राखत, हरि ब्‍यौहार ।।89।।

मोहन जीवन प्‍यारे कस हित कीन ।
दरसन ही कों तरफत, ये दृग मीन ।190।।

भज मन राम सियापति, रघुकुल ईस ।
दीनबंधु दुख टारन, कौसलधीस ।।91।।

भज नरहरि, नारायन, तजि बकवाद ।
प्रगटि खंभ ते राख्‍यो, जिन प्रहलाद ।।92।।

गोरज-धन-बिच राखत, श्री ब्रजचंद ।
तिय दामिनि जिमि हेरत, प्रभा अमंद ।।93।।

ग़र्कज़ मै शुद आलम, चंद हज़ार ।
बे दिलदार के गीरद, दिलम करार ।।94।। (फ़ारसी)

दिलबर ज़द बर जिगरम, तीरे निगाह ।
तपदि’ जाँ मीआयद, हरदम आह ।।95।। (फ़ारसी)

कै गायम अहवालम, पेशे-निगार ।
तनहा नज़र न आयद, दिल लाचार ।।96।। (फ़ारसी)

लोग लुगाई हिल मिल, खेलत फाग ।
पर्यौ उड़ावन मोकौं, सब दिन काग ।।9711

मो जिय कौरी सिगरी, ननद जिठानि ।
भई स्‍याम सों तब त, तनक पिछानि ।।98।।

होत विकल अनलेखे, सुघर कहाय ।
को सुख पावत वजनी, नेह लगाय ।।99।।

अहो सुधाकर प्‍यारे, नेह निचोर ।
देखन ही कों तरसै, नैन चकोर ।।100।।

आँखिन देखत सब ही, कहत सुधारि ।
पै जग साँची प्रीत न, चातक टारि ।।101।।

पथिक पाय पनघटवा कहत पियाव ।
पैयाँ परौं ननदिया, फेरि कहाव ।।102।।

बरि गइ हाथ उपरिया, रहि गइ आगि ।
घर कै बाट बिसरि गई, गुहनैं लागि ।।103।।

अनधन देखि लिलरवा, अनख न धार ।
समलहु दिय दुति मनसिज, भल करतार ।।104।।

जलज बदन पर थिर अलि, अनखन रूप ।
लीन हार हिय कमलहि, डसत अनूप ।।105।।

 

 

Leave a Reply