बरगद-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

बरगद-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

निश्चिन्त चारुजल ताल-तीर
है खड़ा एक बरगद गम्भीर,
पत्ते-पत्ते में सघन, श्यामद्युति हरियाली ।

डोलता दिवस भर छवि बिखेर,
जब निश आती, झूमता पेड़,
गुंजित विहंग-कलकूजन से डाली-डाली ।

भीतर-भीतर मृत्तिका फोड़
वट फैल गया है सभी ओर
पाताल-लोक तक अपनी राह बनाकर ।

कर अध:ऊर्ध्व सम्यक् प्रसार
है तोल रहा तरु महाकार
फुनगी-तरंग पर सारा व्योम उठा कर ।

वल्लियों-बरोहों ने मिल कर
रच दिया स्निग्ध, शीतल, सुन्दर
ममता का घन छाया-वितान निर्जन में ।

आकर्षपूर्ण इंगित, छवि का,
कवि आए, जा पहुंची कविता,
बंध गए यहाँ दोनों परिणय-बंधन में ।

बजते अदृश्य शत वाद्य-यन्त्र,
गूँजता मन्द, मृदु मोह-मन्त्र
डोलता मुग्धमन वक्रश्रृंग मृग मद में ।

आता भुजंग होकर विभोर,
आनन्द-मग्न मणिकंठ मोर
नाचते ठुमक इस शीतल छाँह सुखद में ।

ऊपर से आती गंग-धार-
को शिव ने निज कुंतल पसार
था डाल दिया नीचे भू के प्रांगण में ।

पर, वट ने निज आदर्श पाल,
धरती की गंगा को उछाल
है चढ़ा रखा ऊपर हिमलोक, गगन में ।

उमड़ेगा महाप्रलय का जल,
डूबेगी जब यह सृष्टि सकल,
ऊपर-नीचे जल ही जल दीख पड़ेगा ।

तब भी अमग्न यह वट अक्षय,
योगीन्द्र-सदृश निष्कम्प, अभय ।
हो खड़ा प्रलय-वर्षण मेँ स्नान करेगा ।

(मूल गुजराती कवि: श्री बालकृष्ण दवे)

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