बदन सराय -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Badan Sarai Part 1

बदन सराय -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Badan Sarai  Part 1

तुम्हारे पास ही रहते न छोड़ कर जाते

तुम्हारे पास ही रहते न छोड़ कर जाते
तुम्हीं नवाज़ते तो क्यों इधर-उधर जाते

किसी के नाम से मंसूब ये इमारत थी
बदन सराय नहीं था कि सब ठहर जाते

कभी थकन के असर का पता नहीं चलता

कभी थकन के असर का पता नहीं चलता
वो साथ हो तो सफ़र का पता नहीं चलता

वही हुआ कि मैं आँखों में उसकी डूब गया
वो कह रहा था भँवर का पता नहीं चलता

उलझ के रह गया सैलाब कुर्रए-दिल से
नहीं तो दीदा-ए-तर का पता नहीं चलता

उसे भी खिड़कियाँ खोले ज़माना बीत गया
मुझे भी शामो-सहर का पता नहीं चलता

ये मन्सबो का इलाक़ा है इसलिए शायद
किसी के नाम से घर का पता नहीं चलता

बंद कर खेल-तमाशा हमें नींद आती है

बंद कर खेल-तमाशा हमें नींद आती है
अब तो सो जाने दे दुनिया हमें नींद आती है

डूबते चाँद-सितारों ने कहा है हमसे
तुम ज़रा जागते रहना हमें नींद आती है

दिल की ख़्वाहिश कि तेरा रास्ता देखा जाए
और आँखों का ये कहना हमें नींद आती है

अपनी यादों से हमें अब तो रिहाई दे दे
अब तो ज़ंज़ीर न पहना हमें नींद आती है

छाँव पाता है मुसाफ़िर तो ठहर जाता है
ज़ुल्फ़ को ऐसे न बिखरा हमें नींद आती है

रोने में इक ख़तरा है, तालाब, नदी हो जाते हैं

रोने में इक ख़तरा है, तालाब, नदी हो जाते हैं
हँसना भी आसान नहीं है, लब ज़ख़्मी हो जाते हैं

स्टेशन से वापस आकर बूढ़ी आँखे सोचती हैं
पत्ते देहाती होते हैं, फल शहरी हो जाते हैं

गाँव के भोले-भाले वासी, आज तलक ये कहते हैं
हम तो न लेंगे जान किसी की, राम दुखी हो जाते हैं

सब से हंस कर मिलिए-जुलिए, लेकिन इतना ध्यान रहे
सबसे हंस कर मिलने वाले रुसवा भी हो जाते हैं

अपनी अना को बेच के अक्सर लुक़मा-ए-तर की चाहत में
कैसे-कैसे सच्चे शायर दरबारी हो जाते हैं

इन्सान थे कभी मगर अब ख़ाक हो गये

इन्सान थे कभी मगर अब ख़ाक हो गये
ले ऐ ज़मीन हम तेरी ख़ूराक हो गये

रखते हैं हमको चाहने वाले संभाल के
हम नन्हे रोज़ादार की मिस्वाक हो गये

आँसू नमक मिला हुआ पानी ही थे मगर
आँखों में रहते-रहते ख़तरनाक हो गये

मसरूफ़ पर्दापोशी में रहते हैं हर घड़ी
आँसू हमारी आँखों की पोशाक हो गये

दुनिया जो चाहती थी मुनव्वर वो हो गया
हम भी शिकारे-ग़र्दिशे-अफ़लाक हो गये

हम कुछ ऐसे तिरे दीदार में खो जाते हैं

हम कुछ ऐसे तिरे दीदार में खो जाते हैं
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं

मुस्तक़िल जूझना यादों से बहुत मुश्किल है
रफ़्ता-रफ़्ता सभी घर-बार में खो जाते हैं

इतना साँसों की रफ़ाक़त पे भरोसा न करो
सब के सब मिट्टी के अम्बार में खो जाते हैं

मेरी ख़ुद्दारी ने एहसान किया है मुझ पर
वर्ना जो जाते हैं दरबार में खो जाते हैं

ढूँढने रोज़ निकलते हैं मसाइल हम को
रोज़ हम सुर्ख़ी-ए-अख़बार में खो जाते हैं

क्या क़यामत है कि सहराओं के रहने वाले
अपने घर के दर-ओ-दीवार में खो जाते हैं

कौन फिर ऐसे में तनक़ीद करेगा तुझ पर
सब तिरे जुब्बा-ओ-दस्तार में खो जाते हैं

अब मदरसे भी हैं तेरे शर से डरे हुए

अब मदरसे भी हैं तेरे शर से डरे हुए
जायें कहाँ परिन्दे शजर से डरे हुए

शायद बरसते देख लिया है इन्हें कभी
बादल बहुत हैं दीदा-ए-तर से डरे हुए

मक़तल से ख़ाली हाथ पलटना पड़ा मुझे
सारे सख़ी थे कासा-ए-सर से डरे हुए

हम दिलजलों की रास न आयेंगी चाहतें
छूते नहीं नमक भी शकर से डरे हुए

शायद जली हैं फिर कहीं नज़दीक बस्तियाँ
गुज़रे हैं कुछ परिन्दे इधर से डरे हुए

तेरे लिए मैं शहर में रुस्वा बहुत हुआ

तेरे लिए मैं शहर में रुस्वा बहुत हुआ
इस कारोबार में ख़सारा बहुत हुआ

ख़ुशबू पे चाँदनी पे ग़ज़ल पर शबाब पर
सच कह रहा हूँ आपका धोका बहुत हुआ

छुपता नहीं है चाँद भी बादल में रात भर
दीदार से नवाज़िये परदा बहुत हुआ

नाकाम हो गयी है मुहब्बत तो ग़म नहीं
हर सिम्त अपने इश्क़ का चर्चा बहुत हुआ

दिल पहले कहाँ इस तरह ग़मगीन रहा है

दिल पहले कहाँ इस तरह ग़मगीन रहा है
लगता है कोई मुझसे तुझे छीन रहा है

ऐ ख़ाके-वतन तेरी मुहब्बत के नशे में
मुझ जैसा मुसलमान भी बेदीन रहा है

हर शाख़े-समरदार पे फेंका करो पत्थर
दुनिया का हमेशा यही आईन रहा है

कुछ मोड़ भी आते हैं मुहब्बत में ख़तरनाक
कुछ इश्क भी ख़तरात का शौक़ीन रहा है

वो नम आँखें लबों से यूँ कहानी छीन लेती हैं

वो नम आँखें लबों से यूँ कहानी छीन लेती हैं
हवायें जिस तरह बादल से पानी छीन लेती हैं,

वज़ारत की हवस, दौलत की चाहत,गेसु-ए-जानाँ
मियाँ ये ख़्वाहिशें शोलाबयानी छीन लेती हैं,

मसायल ने हमें बूढ़ा किया है वक़्त से पहले
घरेलू उलझनें अक्सर जवानी छीन लेती हैं,

कहाँ की दोस्ती,कैसी मुरव्वत, क्या रवा-दारी
नई क़दरें,सभी चीज़ें पुरानी छीन लेती हैं..!!

जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है

जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है
हर एक पत्थर से मेरे सर का कुछ रिश्ता निकलता है

डरा -धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो
कहीं तलवार से भी पाँव का काँटा निकलता है?

ज़रा-सा झुटपुटा होते ही छुप जाता है सूरज भी
मगर इक चाँद है जो शब में भी तन्हा निकलता है

किसी के पास आते हैं तो दरिया सूख जाते हैं
किसी की एड़ियों से रेत में चश्मा निकलता है

फ़ज़ा में घोल दीं हैं नफ़रतें अहले-सियासत ने
मगर पानी कुएँ से आज तक मीठा निकलता है

जिसे भी जुर्मे-ग़द्दारी में तुम सब क़त्ल करते हो
उसी की जेब से क्यों मुल्क का झंडा निकलता है

दुआएँ माँ की पहुँचाने को मीलों-मील आती हैं
कि जब परदेस जाने के लिए बेटा निकलता है

हमारी दोस्ती से दुश्मनी शरमाई रहती है

हमारी दोस्ती से दुश्मनी शरमाई रहती है
हम अकबर हैं हमारे दिल में जोधाबाई रहती है

किसी का पूछना कब तक हमारे राह देखोगे
हमारा फ़ैसला जब तक कि ये बीनाई रहती है

मेरी सोहबत में भेजो ताकि इसका डर निकल जाए
बहुत सहमी हुए दरबार में सच्चाई रहती है

गिले-शिकवे ज़रूरी हैं अगर सच्ची महब्बत है
जहाँ पानी बहुत गहरा हो थोड़ी काई रहती है

बस इक दिन फूट कर रोया था मैं तेरी महब्बत में
मगर आवाज़ मेरी आजतक भर्राई रहती है

ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे मुल्क को गन्दी सियासत से
शराबी देवरों के बीच में भौजाई रहती है

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