बच्चे नहीं जानते-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

बच्चे नहीं जानते-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

रेत बजरी के बनजारों ने
बदल दिए हैं बच्चों के खिलौने।
अब वह
मिट्टी के घर नहीं बनाते।
बरगद या पीपल के पत्तों से
बैलों की जोड़ी
टहनियों से हल जुआठा।
सन की रस्सी बट कर
हल नहीं नाधते।
तीखे शूलों का
फाल नहीं बनाते।

वह जान गए हैं
कि खेत खा जाते हैं
मेरे बापू को जड़ सहित।
हल के कूँडों में अव्वल तो भूख उगती है।
यदि कभी फसल हो जाए
तो लाभ हमें नहीं देती।
आढ़तिए के हक़ में ही
भुगतती है सालों साल।

अब वह बाजार से
लकड़ी के बने
ट्रक ले आए हैं।
नंग धड़ंगों ने
रेत की ढेरी इकट्ठी कर ली है।
बैठ गए हैं पास, ग्राहक की प्रतीक्षा में।
बच्चे नहीं जानते कि
हमें स्कूल से मिलता सबक कच्ची लस्सी है।
जिसमें से कभी भी
मक्खन का लोंदा नहीं निकलता।
वह तो और स्कूल हैं
जहाँ मलाई मथते हैं
मक्खन घी के बनजारे।

बच्चे बड़े भ्रम में सोचते हैं
रेत बजरी बेंच कर
हम भी अमीर हो जाएँगे।
घूमती कुर्सी पर बैठेंगे।
हुक्म चलाएँगे।
लोगों को डराएँगे।

पर बच्चे नहीं जानते
कि उनके ट्रक खिलौने हैं
असली ट्रकों के
टायरों तले कुचले जाएँगे
तुम्हारे सपनों की तरह।
इस मार्ग पर चलने के लिए
बाहुबली चाहिए हैं।
तुम अभी बहुत नन्हे हो।

 

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