बच्चे-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

बच्चे-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

जी चाहता है, सितारों के साथ
कोई सरोकार कर लूँ।
जिनकी रोशनी तक हाथ नहीं पहुंचते,
उन्हें दूर से प्यार का लूँ।

जी चाहता है, फूलों से कहुँ
यार ! बात करो ।
रात के अँधेरे में यहाँ कौन देखता है,
जो अफवाह फैलायेगा
कि फूल भी बोलते हैं,
अगर कोई दर्द का मारा मिल जाये,
तो उससे अपना भेद खोलते हैं?

आदमी का मारा आदमी
कुत्ते पालता है ।
मगर, मैं घबरा कर
बच्चों के पास जाना चाहता हूँ
जहाँ निर्द्वन्द्व हो कर बोलूँ
गाऊँ, चुहलें मचाऊँ
और डोलूँ।

बूढ़ों का हलकापन
बूढ़ों को पसन्द नहीं आता है ।
मगर, बच्चे उसे प्यार करते हैं ।
भगवान की कृपा है
कि वे अभी गंभीरता से डरते हैं ।

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