बगूले उठ चले थे और न थी कुछ देर आँधी में-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

बगूले उठ चले थे और न थी कुछ देर आँधी में-ग़ज़लें-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

बगूले उठ चले थे और न थी कुछ देर आँधी में
कि हम से यार से हो गई मुड़भेड़ आँधी में

जता कर ख़ाक का उड़ना दिखा कर गर्द का चक्कर
वहीं हम ले चले उस गुल-बदन को घेर आँधी में

रक़ीबों ने जो देखा ये उड़ा कर ले चला उस को
पुकारे हाए ये कैसा हुआ अंधेर आँधी में

रक़ीबों की मैं अब ख़्वारी ख़राबी क्या लिखूँ बारे
भरी नयनों में उन के ख़ाक दस दस सेर आँधी में

वो दौडे तो बहुत लेकिन उन्हें आँधी में क्या सूझे
ज़ि-बस हम उस परी को लाए घर में घेर आँधी में

‘नज़ीर’ आँधी में कहते हैं कि अक्सर देव होते हैं
मियाँ हम को तो ले जाती है परियाँ घेर आँधी में

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