बंद हो पिँजरे मेँ हम-प्रशांत पारस-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Prashant Paras

बंद हो पिँजरे मेँ हम-प्रशांत पारस-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Prashant Paras

बंद हो पिँजरे मेँ हम,
आजादी के सपने जीते,
अपनी मीठी स्वर से हम,
इंसानो पर भी रौब जमा जाते,
हम है गगन के वाशिंदे,
कहलाते है हम परिंदे।

मग्न हो अपने धुन में,
आसमान मे हम उङते,
बहती धारा चीर के,
हम नदी में मोती चुगते,
न अल्लाह, न भगवान
हम हैँ मंजिल के बंदे,
हम हैं गगन के वाशिंदे,
कहलाते है हम परिँदे।

सागर से सागर, देश से परदेश,
मंजिल की तलाश मेँ उङते जाते,
या तो मंजिल मिलती,
या मौत को गले लगा लेते,
लक्ष्य के लिए ही जीते हम,
लक्ष्य के लिए ही कूर्बानी देते,
हम है गगन के वाशिंदे,
कहलाते है हम परिदेँ।

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