फूल की स्मरण प्रतिभा-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

फूल की स्मरण प्रतिभा-सागर-मुद्रा अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

यह देने का अहंकार छोड़ो।
कहीं है प्यार की पहचान
तो उसे यों कहो:
‘मधुर, यह देखो

फूल। इसे तोड़ो;
घुमा-कर फिर देखो,
फिर हाथ से गिर जाने दो:
हवा पर तिर जाने दो-
(हुआ करे सुनहली) धूल।’

फूल की स्मरण-प्रतिभा ही बचती है।
तुम नहीं। न तुम्हारा दान।

नयी दिल्ली, नवम्बर, 1968

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