फूँक दे जो प्राण में उत्तेजना- रेणुका-रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

फूँक दे जो प्राण में उत्तेजना- रेणुका-रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

फूँक दे जो प्राण में उत्तेजना,
गुण न वह इस बाँसुरी की तान में।
जो चकित करके कँपा डाले हृदय,
वह कला पाई न मैंने गान में।

जिस व्यथा से रो रहा आकाश यह,
ओस के आँसू बहाकर फूल में,
ढूँढती उसकी दवा मेरी कला
विश्व-वैभव की चिता की धूल में।

कूकती असहाय मेरी कल्पना
कब्र में सोये हुओं के ध्यान में,
खंडहरों में बैठ भरती सिसकियाँ
विरहिणी कविता सदा सुनसान में।

देख क्षण-क्षण मैं सहमता हूँ अरे,
व्यापिनी निस्सारता संसार की,
एक पल ठहरे जहाँ जग ही अभय,
खोज करता हूँ उसी आधार की।

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