फिर भी तू इंतज़ार कर शायद-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

फिर भी तू इंतज़ार कर शायद-दर्द आशोब -अहमद फ़राज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmed Faraz,

फिर उसी राहगुज़र पर शायद
हम कभी मिल सकें मगर शायद

जिनके हम मुंतज़िर रहे उनको
मिल गए और हमसफ़र शायद

जान पहचान से भी क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त ग़ौर कर ! शायद

अजनबीयत की धुंध छँट जाए
चमक उठ्ठे तिरी नज़र शायद

ज़िन्दगी भर लहू रुलाएगी
यादे-याराने-बेख़बर शायद

जो भी बिछड़े वो कब मिले हैं ‘फ़राज़’
फिर भी तू इंतज़ार कर शायद

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