फिर कबीर -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana part 8

फिर कबीर -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana part 8

तेरे चेहरे पे कोई ग़म नहीं देखा जाता

तेरे चेहरे पे कोई ग़म नहीं देखा जाता
हमसे उतरा हुआ परचम नहीं देखा जाता

वो हमें जब भी बुलाएगा चले आएँगे
उससे मिलना हो तो मौसम नहीं देखा जाता

सफ़र में जो भी हो रख़्ते-सफ़र उठाता है

सफ़र में जो भी हो रख़्ते-सफ़र उठाता है
फलों का बोझ तो हर इक शजर उठाता है

हमारे दिल में कोई दूसरी शबीह नहीं
कहीं किराए पे कोई ये घर उठाता है

बिछड़ के तुझ से बहुत मुज़महिलहै दिल लेकिन
कभी कभी तो ये बीमार सर उठाता है

वो अपने काँधों पे कुन्बे का बोझ रखता है
इसीलिए तो क़दम सोचकर उठाता है

मैं नर्म मिट्टी हूँ तुम रौंद कर गुज़र जाओ
कि मेरे नाज़ तो बस क़ूज़ागर उठाता है

चमन में सुबह का मंज़र बड़ा दिलचस्प होता है

चमन में सुबह का मंज़र बड़ा दिलचस्प होता है
कली जब सो के उठती है तो तितली मुस्कुराती है

हमें ऐ ज़िंदगी तुझपर हमेशा रश्क़ आता है
मसायल में घिरी रहती है फिर भी मुस्कुराती है

बड़ा गहरा तआल्लुक़ है सियासत का तबाही से
कोई भी शहर जलता है तो दिल्ली मुस्कुराती है

तुम्हारे पास ही रहते न छोड़कर जाते

तुम्हारे पास ही रहते न छोड़कर जाते
तुम्हीं नवाज़ते तो क्यों इधर उधर जाते

किसी के नाम से मंसूब यह इमारत थी
बदन सराय नहीं था कि सब ठहर जाते

सरक़े का कोई शेर ग़ज़ल में नहीं रक्खा

सरक़े का कोई शेर ग़ज़ल में नहीं रक्खा
हमने किसी लौंडी को महल में नहीं रक्खा

मिट्टी का बदन कर दिया मिट्टी के हवाले
मिट्टी को किसी ताजमहल में नहीं रक्खा

मेरी चाहत का फ़क़ीरी से सिरा मिलता है

मेरी चाहत का फ़क़ीरी से सिरा मिलता है
कोई नंबर भी मिलाता हूँ तेरा मिलता है

तुमने इन आँखों के बरसने से परेशाँ क्यों हो
ऐसे मौसम में तो हर पेड़ हरा मिलता है

एक दीया गाँव में हर रोज़ बुझाती है हवा
रोज़ फुटपाथ पर एक शख़्स मरा मिलता है

ऐ महब्बत तुझे किस ख़ाने में रक्खा जाए
शहर का शहर तो नफ़रत से भरा मिलता है

आपसे मिलके ये अहसास है बाक़ी कि अभी
इस सियासत में भी इंसान खरा मिलता है

ये सियासत है तो फिर मुझको इजाज़त दी जाए
जो भी मिलता है यहाँ ख़्वाजा-सरा मिलता है

खण्डहर-से दिल में फिर कोई तमन्ना घर बनाती है

खण्डहर-से दिल में फिर कोई तमन्ना घर बनाती है
मेरे कमरे में इक नन्ही-सी चिड़िया घर बनाती है

मुक़द्दर के लिखे को लड़कियाँ बिल्कुल नहीं पढ़तीं
वो देखो रेत पर बैठी वि गुड़िया घर बनाती है

किसी की बेघरी मंज़ूर होती तो महक होता
उधर देखो मेरे छप्पर में चिड़िया घर बनाती है

निगल लेती है लड़कों को बड़े शहरों की रंगीनी
न जाने किस तमना में ये बुढ़िया घर बनाती है

जला कर राख कर देती है एक लम्हे में शहरों को
सियासत बस्तियों को रोज़ कूड़ाघर बनाती है

चलो इम्दाद करना सीख लें हम भी हुकूमत से
ये पक्का घर गिरा देती है कच्चा घर बनाते है

नहीं सुनता है मेरी तो मेरे बच्चों की ही सुन ले
ये वो मौसम है जब चिड़िया भी अपना घर बनाती है

मौला ये तमन्ना है कि जब जान से जाऊँ

मौला ये तमन्ना है कि जब जान से जाऊँ
जिस शान से आया हूँ उसी शान से जाऊँ

बच्चों की तरह पेड़ों की शाख़ों से मैं कूदूँ
चिड़ियों की तरह उड़के मैं खलिहान से जाऊँ

हर लफ़्ज़ महकने लगे लिक्खा हुआ मेरा
मैं लिपटा हुआ यादों के लोबान से जाऊँ

मुझमें कोई वीराना भी आबाद है शायद
साँसों ने भी पूछा था बियाबान से जाऊँ

ज़िंदा मुझे देखेगी तो माँ चीख उठेगी
क्या ज़ख़्म लिए पीठ पे मैदान से जाऊँ

क्या सूखे हुए फूल की क़िस्मत का भरोसा
मालूम नहीं कब तेरे गुलदान से जाऊँ

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