फिर कबीर -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana part 5

फिर कबीर -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana part 5

अना की मोहनी सूरत बिगाड़ देती है

अना की मोहनी सूरत बिगाड़ देती है
बड़े-बड़ों को ज़रूरत बिगाड़ देती है

किसी भी शहर के क़ातिल बुरे नहीं होते
दुलार कर के हुक़ूमत बिगाड़ देती है

इसीलिए तो मैं शोहरत से बच के चलता हूँ
शरीफ़ लोगों को औरत बिगाड़ देती है

उदास रहता है बैठा शराब पीता है

उदास रहता है बैठा शराब पीता है
वो जब भी होता है तन्हा शराब पीता है

तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो
तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है

वो मेरे होंठों पे रखता है फूल-सी आँखें
ख़बर उड़ाओ कि ‘राना’ शराब पीता है

फ़रिश्ते आकर उनके जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं

फ़रिश्ते आकर उनके जिस्म पर ख़ुश्बू लगाते हैं
वो बच्चे रेल के डिब्बों में जो झाड़ू लगाते हैं

अँधेरी रात में अक्सर सुनहरी मिशअलें ले कर
परिंदों की मुसीबत का पता जुगनू लगाते हैं

दिलों का हाल आसनी से कब मालूम होता है
कि पेशानी पे चंदन तो सभी साधू लगाते हैं

ते माना आपको शोले बुझाने में महारत है
मगर वो आग जो मज़लूम के आँसू लगाते हैं

किसी के पाँव की आहट पे दिल ऐसे उछलता है
छलाँगे जंगलों में जिस तरह आहू लगाते हैं

बहुत मुमकिन है अब मेरा चमन वीरान हो जाए
सियासत के शजर पर घोंसले उल्लू लगाते हैं

मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है

मुहब्बत करने वालों में ये झगड़ा डाल देती है
सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा डाल देती है

तवायफ़ की तरह अपने ग़लत कामों के चेहरे पर
हुकूमत मंदिरों-मस्जिद का पर्दा डाल देती है

हुकूमत मुँह-भराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है
ये हर कुत्ते आगे शाही टुकड़ा डाल देती है

कहाँ की हिजरतें कैसा सफ़र कैसा जुदा होना
किसी की चाह पैरों में दुपट्टा डाल देती है

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है
कहीं भी शाख़े-गुल देखे तो झूला डाल देती है

भटकती है हवस दिन-रात सोने की दुकानों में
ग़रीबी कान छिदवाती है तिनका डाल देती है

हसद की आग में जलती है सारी रात वह औरत
मगर सौतन के आगे अपना जूठा डाल देती है

कभी थकन के असर का पता नहीं चलता

कभी थकन के असर का पता नहीं चलता
वो साथ हो तो सफर का पता नहीं चलता

वही हुआ कि मैं आँखों में उसकी डूब गया
वो कह रहा था भँवर का पता नहीं चलता

मैं खुल के हँस तो रहा हूँ फ़क़ीर होते हुए

मैं खुल के हँस तो रहा हूँ फ़क़ीर होते हुए
वो मुस्कुरा भी न पाया अमीर होते हुए

यहाँ पे इज़्ज़तें मरने के बाद मिलती हैं
मैं सीढ़ियों पे पड़ा हूँ कबीर होते हुए

अजीब खेल है दुनिया तेरी सियासत का
मैं पैदलों से पिटा हूँ वज़ीर होते हुए

ये एहतेज़ाज़ की धुन का ख़याल रखते हैं
परिंदे चुप नहीं रहते असीर होते हुए

नये तरीक़े से मैंने ये ये जंग जीती है
कमान फेंक दी तरकश में तीर होते हुए

जिसे भी चाहिए मुझसे दुआएँ ले जाए
लुटा रहा हूँ मैं दौलत फ़क़ीर होते हुए

तमाम चाहने वालों को भूल जाते हैं
बहुत-से लोग तरक़्क़ी-पज़ीर होते हुए

कहीं पर छुप के रो लेने को तहख़ाना भी होता था

कहीं पर छुप के रो लेने को तहख़ाना भी होता था
हर एक आबाद घर में एक वीराना भी होता था

तयम्मुम के लिए लिए मिट्टी का टुकड़ा तक नहीं मिलता
अभी कल तक घरों में एक वुज़ूख़ाना भी होता था

ये आँखें जिनमें एक मुद्दतसे आँसू तक नहीं आए
उन्हीं आँखों में पहले एक मयख़ाना भी होता था

अभी इस बात को शायद ज़ियादा दिन नहीं गुज़रे
तसव्वुरमें हमारे एक परीख़ाना भी होता था

मुहब्ब्त इतनी सस्ती भी नहीं थी उस ज़माने तक
मुहब्बत करने वाला पहले दीवाना भी होता था

सभी कड़ियाँ सलामत थीं हमारे बीच रिश्तों की
हमें गाहे-ब-गाहे अपने घर जाना भी होता था

मियाँ पंजाब में लाहौर ही शामिल न था पहले
इसी के खेत खलिहानों में हरियाना भी होता था

 

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