फिर आन के इश्रत का मचा ढंग ज़मी पर-होली कविता -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

फिर आन के इश्रत का मचा ढंग ज़मी पर-होली कविता -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

फिर आन के इश्रत का मचा ढंग ज़मी पर।
और ऐश ने अर्सा है किया तंग ज़मीं पर।
हर दिल को खुशी का हुआ आहंग ज़मी पर।
होता है कहीं राग कहीं रंग ज़मीं पर।
बजते हैं कहीं ताल कहीं जंग ज़मीं पर॥
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥1॥

घुंघरू की पड़ी आन के फिर कान में झंकार।
सारंगी हुई बीन तंबूरो की मददगार॥
तबलों के ठुके तबल यह साज़ों के बजे तार।
रागों के कहीं गुल कहीं नाचां के बंधे तार॥
ढोलक कहीं झनकारे हैं मरदंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥2॥

इस रुत में चमन पर भी अजब रंग चढ़ा है।
और जंगलो बन पर भी अजब रंग चढ़ा है।
हर शोख के तन पर भी अजब रंग चढ़ा है।
आशिक़ के बदन पर भी अजब रंग चढ़ा है।
सब ऐश के रंगों में हैं हमरंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥3॥

मारा है निपट होली के रंगों ने अजब जोश।
जो रंग में इक ख़ल्क बनी फिरती है गुलपोश।
है नाच कहीं, राग कहीं, रग कहीं जोश।
पीते हैं नशे ऐश में सब लोटे हैं मदहोश।
माजू कहीं पीते हैं कहीं भंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥4॥

मैख़ानों में देखो तो अजब सैर है यारो।
वां मस्त पड़े लोटे हैं और करते हैं हो! हो!।
मस्ती से सिवा ऐश नहीं होश किसी को।
शीशों में, प्यालों में, सुराही में खुशी हो।
उछले हैं पड़ी बाद-ए-गुलरंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥5॥

”गा गा“ की पुकारें हैं कहीं रंगों की छिड़क है।
मीना की भभक और कहीं सागर की झलक है।
तबलों की सदाएं कहीं तालों की झनक है।
ताली की बहारें कहीं ठिलिया की खड़क है।
बजता है कहीं डफ़ कहीं मुहचंग ॥6॥

मस्ती में उठा आंख जिधर देखो अहा! हा!
नाचे हैं तबायफ़ कहीं मटके है भवय्या।
चलते हैं कहीं जाम कहीं स्वांग का चर्चा।
और रंग की गलियों में जो देखो तो हर इक जा।
बहती हैं उमड़ कर जमनी गंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥7॥

मामूर है खू़बां से गली कूच ओ बाज़ार।
उड़ता है अबीर और कहीं पिचकारी की है मार।
छाया है गुलालों का हर इक जा पै धुआंधार।
पड़ती है जिधर देखो उधर रंग की बौछार।
है रंग छिड़कने से हर एक दंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥8॥

भागे हैं कहीं रंग किसी पर जो कोई डाल।
वह पोटली मारे है उसे दौड़ के फ़िलहाल।
यह टांग घसीटे है तो वह खींचे पकड़ बाल।
वह हाथ मरोड़े तो यह तोड़े है खड़ा गाल।
इस ढब के हर इक जा पे मचे ढंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥9॥

बैठे हैं सब आपस में नहीं एक भी कड़वा।
पिचकारी उठाकर कोई झमकावे है घड़वा।
भरते हैं कहीं मशक कहीं रंग का गड़वा।
क्या शाद वह होता है जिसे कहते हैं भड़वा।
सुनते हैं यहां तक नहीं अब नंग ज़मीं पर।
होली ने मचाया है अज़ब रंग ज़मीं पर॥10॥

 

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