फिरका परस्तों के नाम-नीरज की पाती -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 

फिरका परस्तों के नाम-नीरज की पाती -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

जाँति-पाँति से बड़ा धर्म है,
धर्म ध्यान से बड़ा कर्म है,
कर्म कांड से बड़ा मर्म है,
मगर अभी से बड़ा यहाँ ये छोटा-म इन्सान है
और अगर वह प्यार को तो धरती स्वर्ग समान है।

जितनी देखी दुनिया सबकी देखी दुल्हन ताले में,
कोई कैद पड़ा मस्जिद् में, कोई बन्द शिवाले में
किसको अपना हाथ थमा दूँ किसको अपना मन दे दूँ?
कोई लूटे अँधियारे में, कोई ठगे उजाले में
सबका अलग-अलग ठनगन है
सबका अलग-अलग वंदन है
सबका अलग-अलग चन्दन है

लेकिन मबके सिर के ऊपर नीला एक वितान है,
फिर भी जाने क्यों यह सारी धरती लहू-लुहान है।

हर बगिया पर तार कटीले, हर घर घिरा किवाड़ों से,
हर खिड़की पर परदे, घायल आँगन हर दीवारों से,
किस दरवाज़े करूँ वन्दना, किस देहरी माथा टेकूँ,
काशी में अंधियारा सोया, मथुरा पटी बज़ारों से,

हर घुमाव पर छीन झपट है
इधर प्रेम तो उधर कपट है,
झूँठ किये सच का घूँघट है
फिर भी मनुज अश्रु की गंगा अब तक पावन प्राण है
और नहा ले उसमें तो फिर मानव ही भगवान है।

धरम द्वार पर बाम्हन बैठा, बनिये की बाँदी मंडी
ङंडी मारे एक, भुनाये दूजा किस्मत की हुंडी
हरिजन की बखरी पर पेहरा, ठाकुर का चौपालों पर
गली-गली आबाद, सिर्फ वीरान पिया की पगडण्डी;

बंटी हुई है दुनिया सारी
बंटी हुई है सेज अटारी
बंटी हुई है म्यान कटारी,

मगर अभी तक सेटी न दिल में धड़कन की जो तान है
उस पर बजे सितार अगर तो हर कोलाहल गान है।

यह तो कजराई का आशिक, उसको गरब गुराई पर
यह मोहा मटमैलेपन पर, वह रीझा चटकाई पर
उतने रंग कि चश्मे जितने, जितने दृग उतने शीशे
दुनिया की तस्वीर टंगी है सुरमा और सलाई पर

इधर अंधेरी उधर अंधेरी
आँख-आँख मोतियाँ गुहेरी
कुयला भई रतन की ढेरी
फिर भी रंगों के मेले में खोया सकल जहान है
दिन-दिन जब कुछ और बड़ा हो जाता हर शमशान है।

बंगाली को बंगला प्यारी, तामिल चाहे मदरासी
पंजाबी गुरमुखी उचारे, हिन्दी दिल्ली की दासी
इसकी शहज़ादी अंग्रेजी, उसकी पटरानी संस्कृत
मगर पेम की भाषा अब तक हाय बनी है बनवासी

जितने मुँह उतने अक्षर हैं
जितने घर उतने बिस्तर हैं
कुछ भीतर हैं कुछ बाहर हैं

सोई पर हर साँस जहाँ वह बिस्तर अभी अजान हैं
उसका तकिया बने शब्द तो हर भाषा धनवान है।

पूरब जाये पुरी और पश्चिम दौडे वृन्दावन को
उत्तर बद्रीनाथ चले, रामेश्वर भाये दक्खिन को
इसको प्यारी लगें अज़ाने उसकी कीर्तन पर श्रद्धा
पर न यहाँ कोई जो पूजे मानव औ मानवपन को

एक पेड़ पक्षी हजार हैं
एक चाक लाखों कुम्हार हैं
एक अश्व पर सौ सवार हैं।

पर न किसी को ज्ञात कि सबके ही पीछे तूफान है
ढीली हुई रक़ाब ख़तम तो फिर सब खींचातान है।

चारों ओर लगा है मेला, चल-चलाव है हर पथ पर
इसके हाथ बंधे कंगन में, उसकी लाज झुकी नथ पर
पनघट इधर बुलाता है तो मरघट उधर पुकार रहा,
बड़ी आदमी की मुश्किल है इस अनजाने तीरथ पर

दिशि-दिशि है काँटी का घेरा
उस पर यह आँधी का फेरा
उस पर जर्जर तम्बू-डेरा

फिर भी मुझको प्रिय जग का हर उदय और अवसान है
क्योंकि सभी स्वर्गों से सुन्दर यह काग़ज़ी मकान है।

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