‘फ़िराक़’ इक नई सूरत निकल तो सकती है -कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

‘फ़िराक़’ इक नई सूरत निकल तो सकती है -कविता -फ़िराक़ गोरखपुरी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Firaq Gorakhpuri

 

‘फ़िराक़’ इक नई सूरत निकल तो सकती है
ब-क़ौल उस आँख के दुनिया बदल तो सकती है

तिरे ख़याल को कुछ चुप सी लग गई वर्ना
ब-क़ौल इश्क़ के साँचे में ढल तो सकती है

अब इतनी बंद नहीं ग़म-कदों की भी राहें
हवा-ए-कूच-ए-महबूब चल तो सकती है

बदलता जाए ग़म-ए-रोज़गार का मरकज़
ये चाल गर्दिश-ए-अय्याम चल तो सकती है

तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और
कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है

न भूलना ये है ताख़ीर हुस्न की ताख़ीर
‘फ़िराक़’ आई हुई मौत टल तो सकती है

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