फ़ारसी कविताएँ -सबीर हका -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sabir Haka Part 1

फ़ारसी कविताएँ -सबीर हका -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sabir Haka Part 1

 

बंदूक़

 

अगर उन्‍होंने बंदूक़ का आविष्‍कार न किया होता
तो कितने लोग, दूर से ही,
मारे जाने से बच जाते।
कई सारी चीज़ें आसान हो जातीं।
उन्‍हें मज़दूरों की ताक़त का अहसास दिलाना भी
कहीं ज़्यादा आसान होता।

 

मृत्‍यु का ख़ौफ़

 

ताउम्र मैंने इस बात पर भरोसा किया
कि झूठ बोलना ग़लत होता है
ग़लत होता है किसी को परेशान करना

ताउम्र मैं इस बात को स्‍वीकार किया
कि मौत भी जि़ंदगी का एक हिस्‍सा है

इसके बाद भी मुझे मृत्‍यु से डर लगता है
डर लगता है दूसरी दुनिया में भी मजदूर बने रहने से।

 

आस्‍था

 

मेरे पिता मज़दूर थे
आस्‍था से भरे हुए इंसान
जब भी वह नमाज़ पढ़ते थे
(अल्‍लाह) उनके हाथों को देख शर्मिंदा हो जाता था।

 

मृत्‍यु

 

मेरी मां ने कहा
उसने मृत्‍यु को देख रखा है
उसके बड़ी-बड़ी घनी मूंछें हैं
और उसकी क़द-काठी,जैसे कोई बौराया हुआ इंसान।

उस रात से
मां की मासूमियत को
मैं शक से देखने लगा हूं।

 

राजनीति

 

बड़े-बड़े बदलाव भी
कितनी आसानी से कर दिए जाते हैं।
हाथ-काम करने वाले मज़दूरों को
राजनीतिक कार्यकर्ताओं में बदल देना भी
कितना आसान रहा, है न!
क्रेनें इस बदलाव को उठाती हैं
और सूली तक पहुंचाती हैं।

 

दोस्‍ती

 

मैं (ईश्‍वर) का दोस्‍त नहीं हूं
इसका सिर्फ़ एक ही कारण है
जिसकी जड़ें बहुत पुराने अतीत में हैं :
जब छह लोगों का हमारा परिवार
एक तंग कमरे में रहता था
और (ईश्‍वर) के पास बहुत बड़ा मकान था
जिसमें वह अकेले ही रहता था

 

 

सरकार

 

कुछ अरसा हुआ
पुलिस मुझे तलाश रही है
मैंने किसी की हत्‍या नहीं की
मैंने सरकार के खि़लाफ़ कोई लेख भी नहीं लिखा

सिर्फ़ तुम जानती हो, मेरी प्रियतमा
कि जनता के लिए कितना त्रासद होगा
अगर सरकार महज़ इस कारण मुझसे डरने लगे
कि मैं एक मज़दूर हूं
अगर मैं क्रांतिकारी या बाग़ी होता
तब क्‍या करते वे?

फिर भी उस लड़के के लिए यह दुनिया
कोई बहुत ज़्यादा बदली नहीं है
जो स्‍कूल की सारी किताबों के पहले पन्‍ने पर
अपनी तस्‍वीर छपी देखना चाहता था।

 

इकलौता डर

 

जब मैं मरूंगा
अपने साथ अपनी सारी प्रिय किताबों को ले जाऊंगा
अपनी क़ब्र को भर दूंगा
उन लोगों की तस्‍वीरों से जिनसे मैंने प्‍यार किया।
मेर नये घर में कोई जगह नहीं होगी
भविष्‍य के प्रति डर के लिए।

मैं लेटा रहूंगा। मैं सिगरेट सुलगाऊंगा
और रोऊंगा उन तमाम औरतों को याद कर
जिन्‍हें मैं गले लगाना चाहता था।

इन सारी प्रसन्‍नताओं के बीच भी
एक डर बचा रहता है :
कि एक रोज़, भोरे-भोर,
कोई कंधा झिंझोड़कर जगाएगा मुझे और बोलेगा –

‘अबे उठ जा सबीर, काम पे चलना है।’

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