फ़ना नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिए-ग़ज़लें-बृज नारायण चकबस्त-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Brij Narayan Chakbast

फ़ना नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिए-ग़ज़लें-बृज नारायण चकबस्त-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Brij Narayan Chakbast

फ़ना नहीं है मुहब्बत के रंगो बू के लिए
बहार आलमे-फ़ानी रहे रहे न रहे ।

जुनूने हुब्बे वतन का मज़ा शबाब में है
लहू में फिर ये रवानी रहे रहे न रहे ।

रहेगी आबो-हवा में ख़याल की बिजली
ये मुश्ते-ख़ाक है फ़ानी रहे रहे न रहे ।

जो दिल में ज़ख़्म लगे हैं वो ख़ुद पुकारेंगे
ज़बाँ की सैफ़ बयानी रहे रहे न रहे ।

मिटा रहा है ज़माना वतन के मन्दिर को
ये मर मिटों की निशानी रहे रहे न रहे ।

दिलों में आग लगे ये वफ़ा का जौहर है
ये जमाँ ख़र्च ज़बानी रहे रहे न रहे ।

जो माँगना हो अभी माँग लो वतन के लिए
ये आरज़ू की जवानी रहे रहे न रहे ।

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