फर्क न होगा अंतिम क्षण में- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

फर्क न होगा अंतिम क्षण में- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

यहाँ हिंदू मुसलमां दोनों भाई क्या इसको झुठलाओगे
धर्म के नाम पे नफरत को तुम कब तक गले लगाओगे
कब तक बाहर निकलोगे तुम ऊँच नीच के दलदल से
कब समझोगे सब हैं बराबर कब तक मेल मिलाओगे
हैं एक ही मालिक के सब बंदे धर्म है सबका इन्सानी
ये मिटने वाली दुनिया है तुम कब तक ज्ञान ये पाओगे
क्यों छीन रहे हो फ़ानी दौलत एक दूजे से लालच में
अंत सफर पर कहो मुसाफिर तुम क्या संग ले जाओगे
फर्क न होगा अंतिम क्षण में कंधे चार ही मिलने हैं
मुट्ठी बाँध के आए थे तुम हाथ पसारे जाओगे
वक़्त खतम होने पर होगा फिर दोनों का मोल बराबर
या कब्र में जाकर सोओगे या माटी में मिल जाओगे

Leave a Reply