प्रेम माधुरी-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 2

प्रेम माधुरी-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 2

 पहिले बहु भाँति भरोसो दयो

पहिले बहु भाँति भरोसो दयो, अब ही हम लाइ मिलावती हैं।
‘हरिचंद’ भरोसे रही उनके सखियाँ जो हमारी कहावती हैं। ।
अब वेई जुदा ह्वै रहीं हम सों, उलटो मिलि कै समुझावती हैं।
पहिले तो लगाय के आग अरी ! जल को अब आपुहिं धावती हैं।।४।।

 ऊधो जू सूधो गहो वह मारग

ऊधो जू सूधो गहो वह मारग, ज्ञान की तेरे जहाँ गुदरी है।
कोऊ नहीं सिख मानिहै ह्यां, इक स्याम की प्रीति प्रतीति खरी है।।
ये ब्रजबाला सबै इक सी, हरिचंद जू मण्डली ही बिगरी है।
एक जौ होय तो ज्ञान सिखाइए कूप ही में यहाँ भांग परी है।।५।।

 सखि आयो बसंत रितून को कंत

सखि आयो बसंत रितून को कंत, चहूँ दिसि फूलि रही सरसों।
बर शीतल मंद सुगंध समीर सतावन हार भयो गर सों।।
अब सुंदर सांवरो नंद किसोर कहै ‘हरिचंद’ गयो घर सों।
परसों को बिताय दियो बरसों तरसों कब पाँय पिया परसों।।६।।

 इन दुखियन को न चैन सपनेहुं मिल्यौ

इन दुखियन को न चैन सपनेहुं मिल्यौ,
तासों सदा व्याकुल बिकल अकुलायँगी।

प्यारे ‘हरिचंद जूं’ की बीती जानि औध, प्रान
चाहते चले पै ये तो संग ना समायँगी।

देख्यो एक बारहू न नैन भरि तोहिं यातैं,
जौन जौन लोक जैहैं तहाँ पछतायँगी।

बिना प्रान प्यारे भए दरस तुम्हारे, हाय!
मरेहू पै आंखे ये खुली ही रहि जायँगी।

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