प्रेम-फुलवारी -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 2

प्रेम-फुलवारी -भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 2

प्रीति की रीति ही अति न्यारी

प्रीति की रीति ही अति न्यारी।
लोक-वेद सबसों कछु उलटी केवल प्रेमिन प्यारी ।।
को जानै, समझे को याकों, बिरली जाननहारी ।
‘हरिचंद’ अनुभव ही लखिए, जामै गिरिवरधारी ।।

 जय जय करुनानिधि पिय प्यारे

जय जय करुनानिधि पिय प्यारे ।
सुंदर स्याम मनोहर मूरति ब्रज-जन लोचन-तारे ।।
अगिनित गुन-गन गनू न आवत माया नर-बपु धारे ।
‘हरीचंद’ श्रीराधा-वल्लभ जसुदा-नंद-दुलारे ।।

हमहुं कबहूँ सुख सों रहते

हमहुं कबहूँ सुख सों रहते ।
छाँड़ि जाल सब निसि-दिन मुख सों, केवल कृष्णहिं कहते ।।
सदा मगन लीला-अनुभव में, दृग दोउ अविचल बहते ।
‘हरीचंद’ घनस्याम बिरह इक, जग-दुख तृन-सम दहते ।।

 भौंरा रे, रस के लोभी तेरो का परमान

भौंरा रे, रस के लोभी तेरो का परमान ।
तू रस मस्त फिरत फूलन पर, करि अपने मुख गान ।।
इत सों उत डोलत बौरानो, किये मधुर मधु-पान ।
‘हरिचंद’ तेरे फंद न भूलूँ, बात परी पहिचान ।।

 प्रिय प्राननाथ ! मनमोहन ! सुंदर प्यारे

प्रिय प्राननाथ ! मनमोहन ! सुंदर प्यारे ।
छिन हूँ मत मेरे होहु दृगन तें न्यारे ।।
घनस्याम, गोप-गोपीपति, गोकुलराई ।
वृन्दाबन-रच्छक, ब्रज-सरबस, बलभाई ।।
प्रानहुँ ते प्यारे ! प्रियतम, मीत कन्हाई ।
श्रीराधा-नायक जसुदा-नंद दुलारे ।
छिनहूँ मत मेरे होहु दृगन तें न्यारे ।।

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