प्रेमाश्रु-वर्षण-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 2

प्रेमाश्रु-वर्षण-भारतेंदु हरिश्चंद्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bharatendu Harishchandra 2

 

 सखी री कछु तो तपन जुड़ानी

सखी री कछु तो तपन जुड़ानी।
जब सों सीरी पवन चली है तब सों कछु मन मानी।
कछु रितु बदल गई आली री मनु बरसैगो पानी।
‘हरीचंद’ नभ दौरन लागे बरसा कै अगवानी॥

 भोजन कीजै प्रान-पिआरी

भोजन कीजै प्रान-पिआरी।
भई बड़ी बार हिंडोले झूलत आज भयो श्रम भारी।
बिंजन मीठे दूध सुहातो लीजै भानु-दुलारी।
स्याम-स्याम चरन कमलन पर ‘हरीचंद’ बलिहारी॥

 एरी आजु झूलै छै जी श्याम हिंडोरें

एरी आजु झूलै छै जी श्याम हिंडोरें।
बृंदाबन री सघन कुंज में जमुना जी लेत हिलोरें।
संग थारे बृषभानु-नंदिनी सोहै छै रंग गोरे।
‘हरीचंद’ जीवन-धन वारी मुख लखतीं चित चोरे॥

सखी री ठाढ़े नंद-कुमार

सखी री ठाढ़े नंद-कुमार।
सुभग स्याम घन सुख रस बरसत चितवन माँझ अपार।
नटवर नवल टिपारो सिर पर लकी छबि लाजत मार।
‘हरीचंद’ बलि बूँद निवारत जब बरसत घन-धार॥

Leave a Reply